भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 172

वहाँ चारों ओर श्रेष्ठ ब्राह्मण निवास करते थे। उनमेंसे कुछ लोग केवल वायु पीकर रहते थे। कुछ लोग जल पीकर जीवन धारण करते थे। कुछ लोग निरन्तर जपमें संलग्न रहते थे। कुछ साधक मैत्री-मुदिता आदि साधनाओंद्वारा अपने चित्तका शोधन करते थे। कुछ योगी निरन्तर ध्यानमग्न रहते थे। कोई अग्निहोत्रका धूआँ, कोई गरम-गरम सूर्यकी किरणें और कोई दूध पीकर रहते थे ।। ५६ ।।

गोचारिणोऽथाश्मकुट्टा दन्तोलूखलिकास्तथा ।
मरीचिपाः फेनपाश्च तथैव मृगचारिणः ॥ ५७ ॥
कुछ लोग गोसेवाका व्रत लेकर गौओंके ही साथ रहते और विचरते थे। कुछ लोग खाद्य वस्तुओंको पत्थरसे पीसकर खाते थे और कुछ लोग दाँतोंसे ही ओखली-मूसलका काम लेते थे। कुछ लोग किरणों और फेनोंका पान करते थे तथा कितने ही ऋषि मृगचर्याका व्रत लेकर मृगोंके ही साथ रहते और विचरते थे ।। ५७ ।।

अश्वत्थफलभक्षाश्च तथा ह्युदकशायिनः ।
चीरचर्माम्बरधरास्तथा वल्कलधारिणः ॥ ५८ ॥
कोई पीपलके फल खाकर रहते, कोई जलमें ही सोते तथा कुछ लोग चीर, वल्कल और मृगचर्म धारण करते थे ।। ५८ ।।

सुदुःखान् नियमांस्तांस्तान् वहतः सुतपोधनान् ।
पश्यन् मुनीन् बहुविधान् प्रवेष्टुमुपचक्रमे ॥ ५९ ॥
अत्यन्त कष्टसाध्य नियमोंका निर्वाह करते हुए विविध तपस्वी मुनियोंका दर्शन करते हुए मैंने उस महान् आश्रममें प्रवेश करनेका उपक्रम किया ।। ५९ ।।

सुपूजितं देवगणैर्महात्मभिः
शिवादिभिर्भारत पुण्यकर्मभिः ।
रराज तच्चाश्रममण्डलं सदा
दिवीव राजन् शशिमण्डलं यथा ॥ ६० ॥
भरतवंशी नरेश! महात्मा तथा पुण्यकर्मा शिव आदि देवताओंसे समादृत हो वह आश्रममण्डल सदा ही आकाशमें चन्द्रमण्डलकी भाँति शोभा पाता था ।। ६० ।।

क्रीडन्ति सर्पैर्नकुला मृगैर्व्याघ्राश्च मित्रवत् ।
प्रभावाद् दीप्ततपसां सैनिकर्षान्महात्मनाम् ॥ ६१ ॥
वहाँ तीव्र तपस्यावाले महात्माओंके प्रभाव तथा सांनिध्यसे प्रभावित हो नेवले साँपोंके साथ खेलते थे और व्याघ्र मृगोंके साथ मित्रकी भाँति रहते थे ।। ६१ ।।

तत्राश्रमपदे श्रेष्ठे सर्वभूतमनोरमे ।
सेविते द्विजशार्दूलैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ६२ ॥
नानानियमविख्यातैर्ऋषिभिः सुमहात्मभिः ।
प्रविशन्नेव चापश्यं जटाचीरधरं प्रभुम् ॥ ६३ ॥