भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1721, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1721

ततः परशुमादाय स तं बाहुसहस्रिणम् । चिच्छेद सहसा रामो बहुशाखमिव द्रुमम् ॥ ११ ॥ (ब्राह्मणने कहा—) कमलके समान नेत्रोंवाली देवि! तदनन्तर राजा कार्तवीर्य बड़े क्रोधमें भरकर महर्षि जमदग्निके आश्रमपर परशुरामजीके पास जा पहुँचा और अपने भाई-बन्धुओंके साथ उनके प्रतिकूल बर्ताव करने लगा। उसने अपने अपराधोंसे महात्मा परशुरामजीको उद्विग्न कर दिया। फिर तो शत्रु-सेनाको भस्म करनेवाला अमित तेजस्वी परशुरामजीका तेज प्रज्वलित हो उठा। उन्होंने अपना फरसा उठाया और हजार भुजाओंवाले उस राजाको अनेक शाखाओंसे युक्त वृक्षकी भाँति सहसा काट डाला ॥ ८—११ ॥

तं हतं पतितं दृष्ट्वा समेताः सर्वबान्धवाः । असीनादाय शक्तीश्च भार्गवं पर्यधावयन् ॥ १२ ॥ उसे मरकर जमीनपर पड़ा देख उसके सभी बन्धु-बान्धव एकत्र हो गये तथा हाथोंमें तलवार और शक्तियाँ लेकर परशुरामजीपर चारों ओरसे टूट पड़े ॥ १२ ॥

रामोऽपि धनुरादाय रथमारुह्य सत्वरः । विसृजन् शरवर्षाणि व्यधमत् पार्थिवं बलम् ॥ १३ ॥ इधर परशुरामजी भी धनुष लेकर तुरंत रथपर सवार हो गये और बाणोंकी वर्षा करते हुए राजाकी सेनाका संहार करने लगे ॥ १३ ॥

ततस्तु क्षत्रियाः केचिज्जामदग्न्यभयार्दिताः । विविशुर्गिरिदुर्गाणि मृगाः सिंहार्दिता इव ॥ १४ ॥ उस समय बहुत-से क्षत्रिय परशुरामजीके भयसे पीड़ित हो सिंहके सताये हुए मृगोंकी भाँति पर्वतोंकी गुफाओंमें घुस गये ॥ १४ ॥

तेषां स्वविहितं कर्म तद्भयान्नानुतिष्ठताम् । प्रजा वृषलतां प्राप्ता ब्राह्मणानामदर्शनात् ॥ १५ ॥ उन्होंने उनके डरसे अपने क्षत्रियोचित कर्मोंका भी त्याग कर दिया। बहुत दिनोंतक ब्राह्मणोंका दर्शन न कर सकनेके कारण वे धीरे-धीरे अपने कर्म भूलकर शूद्र हो गये ॥ १५ ॥

एवं ते द्रविडाऽऽभीराः पुण्ड्राश्च शबरैः सह । वृषलत्वं परिगता व्युत्थानात् क्षत्रधर्मिणः ॥ १६ ॥ इस प्रकार द्रविड, आभीर, पुण्ड्र और शबरोंके सहवासमें रहकर वे क्षत्रिय होते हुए भी धर्म-त्यागके कारण शूद्रकी अवस्थामें पहुँच गये ॥ १६ ॥

ततश्च हतवीरासु क्षत्रियासु पुनः पुनः । द्विजैरुत्पादितं क्षत्रं जामदग्न्यो न्यकृन्तत ॥ १७ ॥