महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1745, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतमेवंवादिनं पार्थ शिष्यं गुरुरुवाच ह । सर्वं तु ते प्रवक्ष्यामि यत्र वै संशयो द्विज ॥ ५ ॥ पार्थ! इस प्रकार कहनेवाले उस शिष्यसे गुरु बोले—‘विप्र! तुम्हारा जिस विषयमें संशय है, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा’ ॥ ५ ॥ इत्युक्तः स कुरुश्रेष्ठ गुरुणा गुरुवत्सलः । प्राञ्जलिः परिपप्रच्छ यत्तच्छृणु महामते ॥ ६ ॥ महाबुद्धिमान् कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! गुरुके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उस गुरुके प्यारे शिष्यने हाथ जोड़कर जो कुछ पूछा, उसे सुनो ॥ ६ ॥
शिष्य उवाच
कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत्सत्यं ब्रूहि यत्परम् । कुतो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ७ ॥ शिष्य बोला—विप्रवर! मैं कहाँसे आया हूँ और आप कहाँसे आये हैं? जगत्के चराचर जीव कहाँसे उत्पन्न हुए हैं? जो परमतत्त्व है, उसे आप यथार्थरूपसे बताइये ॥ ७ ॥ केन जीवन्ति भूतानि तेषामायुश्च किं परम् ।