भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1747, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1747

वेदविद्यां समाश्रित्य तत्त्वभूतार्थभावनम् ॥ १५ ॥ गुरु बोले— बेटा! ब्रह्माजीने वेद-विद्याका आश्रय लेकर तुम्हारे पूछे हुए इन सभी प्रश्नोंका उत्तर पहलेसे ही दे रखा है तथा प्रधान-प्रधान ऋषियोंने उसका सदा ही सेवन किया है। उन प्रश्नोंके उत्तरमें परमार्थविषयक विचार किया गया है ॥ १५ ॥ ज्ञानं त्वेव परं विद्मः संन्यासं तप उत्तमम् । यस्तु वेद निराबाधं ज्ञानतत्त्वं विनिश्चयात् । सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते ॥ १६ ॥ हम ज्ञानको ही परब्रह्म और संन्यासको उत्तम तप जानते हैं। जो अबाधित ज्ञानतत्त्वको निश्चयपूर्वक जानकर अपनेको सब प्राणियोंके भीतर स्थित देखता है, वह सर्वगति (सर्वव्यापक) माना जाता है ॥ १६ ॥ यो विद्वान् सहसंवासं विवासं चैव पश्यति । तथैकत्वनानात्वे स दुःखात् परिमुच्यते ॥ १७ ॥ जो विद्वान् संयोग और वियोगको तथा वैसे ही एकत्व और नानात्वको एक साथ तत्त्वतः जानता है, वह दुःखसे मुक्त हो जाता है ॥ १७ ॥ यो न कामयते किंचिन्न किंचिदभिमन्यते । इहलोकस्थ एवैष ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ १८ ॥ जो किसी वस्तुकी कामना नहीं करता तथा जिसके मनमें किसी बातका अभिमान नहीं होता, वह इस लोकमें रहता हुआ ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥ प्रधानगुणतत्त्वज्ञः सर्वभूतविधानवित् । निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशयः ॥ १९ ॥ जो माया और सत्त्वादि गुणोंके तत्त्वको जानता है, जिसे सब भूतोंके विधानका ज्ञान है और जो ममता तथा अहंकारसे रहित हो गया है, वह मुक्त हो जाता है—इसमें संदेह नहीं है ॥ १९ ॥ अव्यक्तबीजप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान् । महाहङ्कारविटप इन्द्रियाङ्कुरकोटरः ॥ २० ॥ महाभूतविशेषश्च विशेषप्रतिशाखवान् । सदापर्णः सदापुष्पः सदा शुभफलोदयः ॥ २१ ॥ अजीवः सर्वभूतानां ब्रह्मबीजः सनातनः । एतज्ज्ञात्वा च तत्त्वानि ज्ञानेन परमासिना ॥ २२ ॥ छित्त्वा चामरतां प्राप्य जहाति मृत्युजन्मनी ।