भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1750, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1750

चातुर्विद्यं तथा वर्णांश्चातुराश्रमिकान् पृथक् । धर्ममेकं चतुष्पादं नित्यमाहुर्मनीषिणः ॥ ३७ ॥ वैसे ही प्रत्येक वर्ण और आश्रमके लिये पृथक्-पृथक् चार विद्याओंका वर्णन करूँगा। मनीषी विद्वान् चार चरणोंवाले एक धर्मको नित्य बतलाते हैं ॥ ३७ ॥

पन्थानं वः प्रवक्ष्यामि शिवं क्षेमकरं द्विजाः । नियतं ब्रह्मभावाय गतं पूर्वं मनीषिभिः ॥ ३८ ॥ द्विजवरो! पूर्व कालमें मनीषी पुरुष जिसका सहारा ले चुके हैं और जो ब्रह्मभावकी प्राप्तिका सुनिश्चित साधन है, उस परम मंगलकारी कल्याणमय मार्गका तुमलोगोंके प्रति उपदेश करता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ ३८ ॥

गदन्तस्तं मयाद्येह पन्थानं दुर्विदं परम् । निबोधत महाभागा निखिलेन परं पदम् ॥ ३९ ॥ सौभाग्यशाली वक्तागण! उस अत्यन्त दुर्विज्ञेय मार्गको, जो कि पूर्णतया परमपदस्वरूप है, यहाँ अब मुझसे सुनो ॥ ३९ ॥

ब्रह्मचारिकमेवाहुराश्रमं प्रथमं पदम् । गार्हस्थ्यं तु द्वितीयं स्याद् वानप्रस्थमतः परम् । ततः परं तु विज्ञेयमध्यात्मं परमं पदम् ॥ ४० ॥ आश्रमोंमें ब्रह्मचर्यको प्रथम आश्रम बताया गया है। गार्हस्थ्य दूसरा और वानप्रस्थ तीसरा आश्रम है, उसके बाद संन्यास आश्रम है। इसमें आत्मज्ञानकी प्रधानता होती है, अतः इसे परमपदस्वरूप समझना चाहिये ॥ ४० ॥

ज्योतिराकाशमादित्यो वायुरिन्द्रः प्रजापतिः । नोपैति यावदध्यात्मं तावदेतान् न पश्यति ॥ ४१ ॥ जबतक अध्यात्मज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती, तबतक मनुष्य इन ज्योति, आकाश, वायु, सूर्य, इन्द्र और प्रजापति आदिके यथार्थ तत्त्वको नहीं जानता (आत्मज्ञान होनेपर इनका यथार्थ ज्ञान हो जाता है) ॥ ४१ ॥

तस्योपायं प्रवक्ष्यामि पुरस्तात् तं निबोधत । फलमूलानिलभुजां मुनीनां वसतां वने ॥ ४२ ॥ वानप्रस्थं द्विजातीनां त्रयाणामुपदिश्यते । सर्वेषामेव वर्णानां गार्हस्थ्यं तद् विधीयते ॥ ४३ ॥ अतः पहले उस आत्मज्ञानका उपाय बतलाता हूँ, सब लोग सुनिये। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीन द्विजातियोंके लिये वानप्रस्थ आश्रमका विधान है। वनमें रहकर मुनिवृत्तिका सेवन करते हुए फल-मूल और वायुके आहारपर जीवन-निर्वाह करनेसे वानप्रस्थ-धर्मका पालन होता है। गृहस्थ-आश्रमका विधान सभी वर्णोंके लिये है ॥ ४२-४३ ॥

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 1750, कुल 2566 में से · BharatKosha