महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1763, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशान्तिकर्ममें शुद्धभावसे प्रवृत्ति, उत्तम बुद्धि, आसक्तिसे छूटना, जगत्के भोगोंसे उदासीनता, ब्रह्मचर्य, सब प्रकारका त्याग, निर्ममता, फलकी कामना न करना तथा धर्मका निरन्तर पालन करते रहना—ये सब सत्त्वगुणके कार्य हैं॥ ६–८ ॥
मुधा दानं मुधा यज्ञो मुधाऽधीतं मुधा व्रतम् । मुधा प्रतिग्रहश्चैव मुधा धर्मो मुधा तपः ॥ ९ ॥ एवंवृत्तास्तु ये केचिल्लोकेऽस्मिन् सत्त्वसंश्रयाः । ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्थास्ते धीराः साधुदर्शिनः ॥ १० ॥ सकाम दान, यज्ञ, अध्ययन, व्रत, परिग्रह, धर्म और तप—ये सब व्यर्थ हैं—ऐसा समझकर जो उपर्युक्त बर्तावका पालन करते हुए इस जगत्में सत्यका आश्रय लेते हैं और वेदकी उत्पत्तिके स्थानभूत परब्रह्म परमात्मामें निष्ठा रखते हैं, वे ब्राह्मण ही धीर और साधुदर्शी माने गये हैं ॥ ९-१० ॥
हित्वा सर्वाणि पापानि निःशोका ह्यथ मानवाः । दिवं प्राप्य तु ते धीराः कुर्वते वै ततस्तनूः ॥ ११ ॥ वे धीर मनुष्य सब पापोंका त्याग करके शोकसे रहित हो जाते हैं और स्वर्गलोकमें जाकर वहाँके भोग भोगनेके लिये अनेक शरीर धारण कर लेते हैं ॥ ११ ॥
ईशित्वं च वशित्वं च लघुत्वं मनसश्च ते । विकुर्वते महात्मानो देवास्त्रिदिवगा इव ॥ १२ ॥ ऊर्ध्वस्रोतस इत्येते देवा वैकारिकाः स्मृताः । सत्त्वगुणसम्पन्न महात्मा स्वर्गवासी देवताओंकी भाँति ईशित्व, वशित्व और लघिमा आदि मानसिक सिद्धियोंको प्राप्त करते हैं। वे ऊर्ध्वस्रोता और वैकारिक देवता माने गये हैं ॥ १२ ½ ॥
विकुर्वन्तः प्रकृत्या वै दिवं प्राप्तास्ततस्ततः ॥ १३ ॥ यद् यदिच्छन्ति तत् सर्वं भजन्ते विभजन्ति च । (योगबलसे) स्वर्गको प्राप्त होनेपर उनका चित्त उन-उन भोगजनित संस्कारोंसे विकृत होता है। उस समय वे जो-जो चाहते हैं, उस-उस वस्तुको पाते और बाँटते हैं ॥ १३ ½ ॥
इत्येतत् सात्त्विकं वृत्तं कथितं वो द्विजर्षभाः । एतद् विज्ञाय लभते विधिवद् यद् यदिच्छति ॥ १४ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे सत्त्वगुणके कार्योंका वर्णन किया। जो इस विषयको अच्छी तरह जानता है, वह जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, उसीको पा लेता है ॥ १४ ॥
प्रकीर्तिताः सत्त्वगुणा विशेषतो यथावदुक्तं गुणवृत्तमेव च । नरस्तु यो वेद गुणानिमान् सदा