महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1767, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राकाश्यं सत्त्वमादित्यः संतापो रजसो गुणः । उपप्लवस्तु विज्ञेयस्तामसस्तस्य पर्वसु ॥ १५ ॥ सूर्यका प्रकाश सत्त्वगुण है, उनका ताप रजोगुण है और अमावास्याके दिन जो उनपर ग्रहण लगता है, वह तमोगुणका कार्य है ॥ १५ ॥ एवं ज्योतिष्षु सर्वेषु निवर्तन्ते गुणास्त्रयः । पर्यायेण च वर्तन्ते तत्र तत्र तथा तथा ॥ १६ ॥ इस प्रकार सभी ज्योतियोंमें तीनों गुण क्रमशः वहाँ-वहाँ उस-उस प्रकारसे प्रकट होते और विलीन होते रहते हैं ॥ १६ ॥ स्थावरेषु तु भावेषु तिर्यग्भावगतं तमः । राजसास्तु विवर्तन्ते स्नेहभावस्तु सात्त्विकः ॥ १७ ॥ स्थावर प्राणियोंमें तमोगुण अधिक होता है, उनमें जो बढ़नेकी क्रिया है वह राजस है और जो चिकनापन है, वह सात्त्विक है ॥ १७ ॥ अहस्त्रिधा तु विज्ञेयं त्रिधा रात्रिर्विधीयते । मासार्धमासवर्षाणि ऋतवः संध्यस्तथा ॥ १८ ॥ गुणोंके भेदसे दिनको भी तीन प्रकारका समझना चाहिये। रात भी तीन प्रकारकी होती है तथा मास, पक्ष, वर्ष, ऋतु और संध्याके भी तीन-तीन भेद होते हैं ॥ १८ ॥ त्रिधा दानानि दीयन्ते त्रिधा यज्ञः प्रवर्तते । त्रिधा लोकास्त्रिधा देवास्त्रिधा विद्यास्त्रिधा गतिः ॥ १९ ॥ गुणोंके भेदसे तीन प्रकारसे दान दिये जाते हैं। तीन प्रकारका यज्ञानुष्ठान होता है। लोक, देव, विद्या और गति भी तीन-तीन प्रकारकी होती है ॥ १९ ॥ भूतं भव्यं भविष्यं च धर्मोऽर्थः काम एव च । प्राणापानावुदानश्चाप्येत एव त्रयो गुणाः ॥ २० ॥ भूत, वर्तमान, भविष्य, धर्म, अर्थ, काम, प्राण, अपान और उदान—ये सब त्रिगुणात्मक ही हैं ॥ २० ॥ पर्यायेण प्रवर्तन्ते तत्र तत्र तथा तथा । यत्किंचिदिह लोकेऽस्मिन् सर्वमेते त्रयो गुणाः ॥ २१ ॥ इस जगत्में जो कोई भी वस्तु भिन्न-भिन्न स्थानोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारसे उपलब्ध होती है, वह सब त्रिगुणमय है ॥ २१ ॥ त्रयो गुणाः प्रवर्तन्ते ह्यव्यक्ता नित्यमेव तु । सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणसर्गः सनातनः ॥ २२ ॥ सर्वत्र तीनों गुणोंकी ही सत्ता है। ये तीनों अव्यक्त और प्रवाहरूपसे नित्य भी हैं। सत्त्व, रज और तम—इन गुणोंकी सृष्टि सनातन है ॥ २२ ॥ तमो व्यक्तं शिवं धाम रजो योनिः सनातनः ।