महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1775, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंबुद्धीन्द्रियाणि पञ्चाहुः पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च । श्रोत्रादीन्यपि पञ्चाहुर्बुद्धियुक्तानि तत्त्वतः ॥ १५ ॥ अविशेषाणि चान्यानि कर्मयुक्तानि यानि तु । उभयत्र मनो ज्ञेयं बुद्धिरस्तु द्वादशी भवेत् ॥ १६ ॥ इन इन्द्रियोंमें पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं और पाँच कर्मेन्द्रिय। वस्तुतः कान आदि पाँच इन्द्रियोंको ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं और उनसे भिन्न शेष जो पाँच इन्द्रियाँ हैं, वे कर्मेन्द्रिय कहलाती हैं। मनका सम्बन्ध ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय—दोनोंसे है और बुद्धि बारहवीं है ॥ १५-१६ ॥
इत्युक्तानीन्द्रियाण्येतान्येकादश यथाक्रमम् । मन्यन्ते कृतमित्येवं विदित्वा तानि पण्डिताः ॥ १७ ॥ इस प्रकार क्रमशः ग्यारह इन्द्रियोंका वर्णन किया गया। इनके तत्त्वको अच्छी तरह जाननेवाले विद्वान् अपनेको कृतार्थ मानते हैं ॥ १७ ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वं विविधमिन्द्रियम् । आकाशं प्रथमं भूतं श्रोत्रमध्यात्ममुच्यते ॥ १८ ॥ अधिभूतं तथा शब्दो दिशस्तत्राधिदैवतम् । अब समस्त ज्ञानेन्द्रियोंके भूत, अधिभूत आदि विविध विषयोंका वर्णन किया जाता है। आकाश पहला भूत है। कान उसका अध्यात्म (इन्द्रिय), शब्द उसका अधिभूत (विषय) और दिशाएँ उसकी अधिदैवत (अधिष्ठातृ देवता) हैं ॥ १८ १/२ ॥
द्वितीयं मारुतो भूत त्वगध्यात्मं च विश्रुता ॥ १९ ॥ स्प्रष्टव्यमधिभूतं च विद्युत् तत्राधिदैवतम् । वायु दूसरा भूत है। त्वचा उसका अध्यात्म तथा स्पर्श उसका अधिभूत सुना गया है और विद्युत् उसका अधिदैवत है ॥ १९ १/२ ॥
तृतीयं ज्योतिरित्याहुश्चक्षुरध्यात्ममुच्यते ॥ २० ॥ अधिभूतं ततो रूपं सूर्यस्तत्राधिदैवतम् । तीसरे भूतका नाम है तेज। नेत्र उसका अध्यात्म, रूप उसका अधिभूत और सूर्य उसका अधिदैवत कहा जाता है ॥ २० १/२ ॥
चतुर्थमापो विज्ञेयं जिह्वा चाध्यात्ममुच्यते ॥ २१ ॥ अधिभूतं रसश्चात्र सोमस्तत्राधिदैवतम् । जलको चौथा भूत समझना चाहिये। रसना उसका अध्यात्म, रस उसका अधिभूत और चन्द्रमा उसका अधिदैवत कहा जाता है ॥ २१ १/२ ॥
पृथिवी पञ्चमं भूतं घ्राणश्चाध्यात्ममुच्यते ॥ २२ ॥ अधिभूतं तथा गन्धो वायुस्तत्राधिदैवतम् ।