महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1798, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंले ।। १४ ।।
दान्तो मैत्रः क्षमायुक्तः केशान् श्मश्रु च धारयन् । जुह्वन् स्वाध्यायशीलश्च सत्यधर्मपरायणः ।। १५ ।। इन्द्रियोंका संयम करे, सबके साथ मित्रताका बर्ताव करे, क्षमाशील बने और दाढ़ी-मूँछ तथा सिरके बालोंको धारण किये रहे। समयपर अग्निहोत्र और वेदोंका स्वाध्याय करे तथा सत्य-धर्मका पालन करे ।। १५ ।।
शुचिदेहः सदा दक्षो वननित्यः समाहितः । एवं युक्तो जयेत् स्वर्गं वानप्रस्थो जितेन्द्रियः ।। १६ ।। शरीरको सदा पवित्र रखे। धर्म-पालनमें कुशलता प्राप्त करे। सदा वनमें रहकर चित्तको एकाग्र किये रहे। इस प्रकार उत्तम धर्मोंको पालन करनेवाला जितेन्द्रिय वानप्रस्थी स्वर्गपर विजय पाता है ।। १६ ।।
गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ वा पुनः । य इच्छेन्मोक्षमास्थातुमुत्तमां वृत्तिमाश्रयेत् ।। १७ ।। ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ कोई भी क्यों न हो, जो मोक्ष पाना चाहता हो, उसे उत्तम वृत्तिका आश्रय लेना चाहिये ।। १७ ।।
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत् । सर्वभूतसुखो मैत्रः सर्वेन्द्रिययतो मुनिः ।। १८ ।। (वानप्रस्थकी अवधि पूरी करके) सम्पूर्ण भूतोंको अभय-दान देकर कर्म-त्यागरूप संन्यास-धर्मका पालन करे। सब प्राणियोंके सुखमें सुख माने। सबके साथ मित्रता रखे। समस्त इन्द्रियोंका संयम और मुनि-वृत्तिका पालन करे ।। १८ ।।
अयाचितमसंकॢप्तमुपपन्नं यदृच्छया । कृत्वा प्राह्णे चरेद् भैक्ष्यं विधूमे भुक्तवज्जने ।। १९ ।। वृत्ते शरावसम्पाते भैक्ष्यं लिप्सेत मोक्षवित् । बिना याचना किये, बिना संकल्पके दैवात् जो अन्न प्राप्त हो जाय, उस भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करे। प्रातःकालका नित्यकर्म करनेके बाद जब गृहस्थोंके यहाँ रसोई-घरसे धुआँ निकलना बंद हो जाय, घरके सब लोग खा-पी चुकें और बर्तन धो-माजकर रख दिये गये हों, उस समय मोक्षधर्मके ज्ञाता संन्यासीको भिक्षा लेनेकी इच्छा करनी चाहिये ।। १९ १/२ ।।
लाभेन च न हृष्येत नालाभे विमना भवेत् । न चातिभिक्षां भिक्षेत केवलं प्राणयात्रिकः ।। २० ।। भिक्षा मिल जानेपर हर्ष और न मिलनेपर विषाद न करे। (लोभवश) बहुत अधिक भिक्षाका संग्रह न करे। जितनेसे प्राण-यात्राका निर्वाह हो उतनी ही भिक्षा लेनी चाहिये ।। २० ।।