महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1805, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
मुक्तिके साधनोंका, देहरूपी वृक्षका तथा ज्ञान-खड्गसे उसे काटनेका वर्णन
ब्रह्मोवाच
संन्यासं तप इत्याहुर्वृद्धा निश्चितवादिनः।
ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था ज्ञानं ब्रह्म परं विदुः ॥ १ ॥
ब्रह्माजीने कहा— महर्षियो! निश्चित बात कहनेवाले और वेदोंके कारणरूप परमात्मामें स्थित वृद्ध ब्राह्मण संन्यासको तप कहते हैं और ज्ञानको ही परब्रह्मका स्वरूप मानते हैं ॥ १ ॥
अतिदूरात्मकं ब्रह्म वेदविद्याव्यपाश्रयम्।
निर्द्वन्द्वं निर्गुणं नित्यमचित्त्यगुणमुत्तमम् ॥ २ ॥
ज्ञानेन तपसा चैव धीराः पश्यन्ति तत् परम्।
वह वेदविद्याका आधार ब्रह्म (अज्ञानियोंके लिये) अत्यन्त दूर है। वह निर्द्वन्द्व, निर्गुण, नित्य, अचिन्त्य गुणोंसे युक्त और सर्वश्रेष्ठ है। धीर पुरुष ज्ञान और तपस्याके द्वारा उस परमात्माका साक्षात्कार करते हैं ॥ २ ½ ॥
निर्णीक्तमनसः पूता व्युत्क्रान्तरजसोऽमलाः ॥ ३ ॥
तपसा क्षेममध्वानं गच्छन्ति परमेश्वरम्।
संन्यासनिरता नित्यं ये च ब्रह्मविदो जनाः ॥ ४ ॥
जिनके मनकी मैल धुल गयी है, जो परम पवित्र हैं, जिन्होंने रजोगुणको त्याग दिया है, जिनका अन्तःकरण निर्मल है, जो नित्य संन्यासपरायण तथा ब्रह्मके ज्ञाता हैं, वे पुरुष तपस्याके द्वारा कल्याणमय पथका आश्रय लेकर परमेश्वरको प्राप्त होते हैं ॥ ३-४ ॥
तपः प्रदीप इत्याहुराचारो धर्मसाधकः।
ज्ञानं वै परमं विद्यात् संन्यासं तप उत्तमम् ॥ ५ ॥
ज्ञानी पुरुषोंका कहना है कि तपस्या (परमात्म-तत्त्वको प्रकाशित करनेवाला) दीपक है, आचार धर्मका साधक है, ज्ञान परब्रह्मका स्वरूप है और संन्यास ही उत्तम तप है ॥ ५ ॥
यस्तु वेद निराधारं ज्ञानं तत्त्वविनिश्चयात्।
सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते ॥ ६ ॥
जो तत्त्वका पूर्ण निश्चय करके ज्ञानस्वरूप, निराधार और सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर रहनेवाले आत्माको जान लेता है, वह सर्वव्यापक हो जाता है ॥ ६ ॥