भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1809, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1809

द्विजवरो! इस अनुमान-प्रमाणके द्वारा इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि अन्तर्यामी परमात्मा सत्त्वस्वरूप आत्मामें स्थित हैं। इस तत्त्वको समझे बिना परम पुरुषको प्राप्त करना सम्भव नहीं है ॥ ६ ॥ क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् । ज्ञानं त्यागोऽथ संन्यासः सात्त्विकं वृत्तमिष्यते ॥ ७ ॥ क्षमा, धैर्य, अहिंसा, समता, सत्य, सरलता, ज्ञान, त्याग तथा संन्यास—ये सात्त्विक बर्ताव बताये गये हैं ॥ ७ ॥ एतेनैवानुमानेन मन्यन्ते वै मनीषिणः । सत्त्वं च पुरुषश्चैव तत्र नास्ति विचारणा ॥ ८ ॥ मनीषी पुरुष इसी अनुमानसे उस सत्त्वस्वरूप आत्माका और परमात्माका मनन करते हैं। इसमें कोई विचारणीय बात नहीं है ॥ ८ ॥ आहुरेके च विद्वांसो ये ज्ञानपरिनिष्ठिताः । क्षेत्रज्ञसत्त्वयोरैक्यमित्येतन्नोपपद्यते ॥ ९ ॥ ज्ञानमें भलीभाँति स्थित कितने ही विद्वान् कहते हैं कि क्षेत्रज्ञ और सत्त्वकी एकता युक्तिसंगत नहीं है ॥ ९ ॥ पृथग्भूतं ततः सत्त्वमित्येतदविचारितम् । पृथग्भावश्च विज्ञेयः सहजश्चापि तत्त्वतः ॥ १० ॥ उनका कहना है कि उस क्षेत्रज्ञसे सत्त्व पृथक् है, क्योंकि यह सत्त्व अविचारसिद्ध है। ये दोनों एक साथ रहनेवाले होनेपर भी तत्त्वतः अलग-अलग हैं—ऐसा समझना चाहिये ॥ १० ॥ तथैकत्वनानात्वमिष्यते विदुषां नयः । मशकोडुम्बरे चैक्यं पृथक्त्वमपि दृश्यते ॥ ११ ॥ इसी प्रकार दूसरे विद्वानोंका निर्णय दोनोंके एकत्व और नानात्वको स्वीकार करता है; क्योंकि मशक और उदुम्बरकी एकता और पृथक्ता देखी जाती है ॥ ११ ॥ मत्स्यो यथान्यः स्यादप्सु सम्प्रयोगस्तथा तयोः । सम्बन्धस्तोयबिन्दूनां पर्णे कोकनदस्य च ॥ १२ ॥ जैसे जलसे मछली भिन्न है तो भी मछली और जल—दोनोंका संयोग देखा जाता है एवं जलकी बूँदोंका कमलके पत्तेसे सम्बन्ध देखा जाता है ॥ १२ ॥

गुरुरुवाच

इत्युक्तवन्तस्ते विप्रास्तदा लोकपितामहम् । पुनः संशयमापन्नाः पप्रच्छुर्मु निसत्तमाः ॥ १३ ॥