महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1816, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथा द्रव्यं च कर्ता च संयोगोऽप्यनयोस्तथा । यह निश्चित बात है कि पुरुषके भोगनेयोग्य द्रव्यमात्रकी संज्ञा सत्त्व है तथा जैसे द्रव्य और कर्ताका सम्बन्ध है, वैसे ही इन दोनोंका सम्बन्ध है ।। १३ १/२ ।। यथा प्रदीपमादाय कश्चित् तमसि गच्छति । तथा सत्त्वप्रदीपेन गच्छन्ति परमैषिणः ।। १४ ।। जैसे कोई मनुष्य दीपक लेकर अन्धकारमें चलता है, वैसे ही परम तत्त्वको चाहनेवाले साधक सत्त्वरूप दीपकके प्रकाशमें साधनमार्गपर चलते हैं ।। १४ ।। यावद् द्रव्यं गुणस्तावत् प्रदीपः सम्प्रकाशते । क्षीणे द्रव्ये गुणे ज्योतिरन्तर्धानाय गच्छति ।। १५ ।। जबतक दीपकमें द्रव्य और गुण रहते हैं, तभीतक वह प्रकाश फैलाता है। द्रव्य और गुणका क्षय हो जानेपर ज्योति भी अन्तर्धान हो जाती है ।। १५ ।। व्यक्तः सत्त्वगुणस्त्वेवं पुरुषोऽव्यक्त इष्यते । एतद् विप्रा विजानीत हन्त भूयो ब्रवीमि वः ।। १६ ।।
ब्रह्माजीका ऋषियोंको उपदेश