भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1824, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1824

सूर्यचन्द्रप्रभालोकं ग्रहनक्षत्रमण्डितम् ॥ ७ ॥
नदीपर्वतजालैश्च सर्वतः परिभूषितम् ।
विविधाभिस्तथा चाद्भिः सततं समलंकृतम् ॥ ८ ॥
आजीवं सर्वभूतानां सर्वप्राणभृतां गतिः ।
एतद् ब्रह्मवनं नित्यं तस्मिंश्चरति क्षेत्रवित् ॥ ९ ॥
यह जगत् एक ब्रह्मवन है। अव्यक्त प्रकृति इसका आदि है। पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ और एक मन—इन सोलह विशेषोंतक इसका विस्तार है। यह चराचर प्राणियोंसे भरा हुआ है। सूर्य और चन्द्रमा आदिके प्रकाशसे प्रकाशित है। ग्रह और नक्षत्रोंसे सुशोभित है। नदियों और पर्वतोंके समूहसे सब ओर विभूषित है। नाना प्रकारके जलसे सदा ही अलंकृत है। यही सम्पूर्ण भूतोंका जीवन और सम्पूर्ण प्राणियोंकी गति है। इस ब्रह्मवनमें क्षेत्रज्ञ विचरण करता है ॥ ७—९ ॥

लोकेऽस्मिन् यानि सत्त्वानि त्रसानि स्थावराणि च ।
तान्येवाग्रे प्रलीयन्ते पश्चाद् भूतकृता गुणाः ।
गुणेभ्यः पञ्चभूतानि एष भूतसमुच्चयः ॥ १० ॥
इस लोकमें जो स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे ही पहले प्रकृतिमें विलीन होते हैं, उसके बाद पाँच भूतोंके कार्य लीन होते हैं और कार्यरूप गुणोंके बाद पाँच भूत लीन होते हैं। इस प्रकार यह भूतसमुदाय प्रकृतिमें लीन होता है ॥ १० ॥

देवा मनुष्या गन्धर्वाः पिशाचासुरराक्षसाः ।
सर्वे स्वभावतः सृष्टा न क्रियाभ्यो न कारणात् ॥ ११ ॥
देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पिशाच, असुर, राक्षस सभी स्वभावसे रचे गये हैं; किसी क्रियासे या कारणसे इनकी रचना नहीं हुई है ॥ ११ ॥

एते विश्वसृजो विप्रा जायन्तीह पुनः पुनः ।
तेभ्यः प्रसूतास्तेष्वेव महाभूतेषु पञ्चसु ।
प्रलीयन्ते यथाकालमूर्म्मयः सागरे यथा ॥ १२ ॥
विश्वकी सृष्टि करनेवाले ये मरीचि आदि ब्राह्मण समुद्रकी लहरोंके समान बारंबार पञ्चमहाभूतोंसे उत्पन्न होते हैं। और उत्पन्न हुए वे फिर समयानुसार उन्हींमें लीन हो जाते हैं ॥ १२ ॥

विश्वसृग्भ्यस्तु भूतेभ्यो महाभूतास्तु सर्वशः ।
भूतेभ्यश्चापि पञ्चभ्यो मुक्तो गच्छेत् परां गतिम् ॥ १३ ॥
इस विश्वकी रचना करनेवाले प्राणियोंसे पञ्च महाभूत सब प्रकार पर हैं। जो इन पञ्च महाभूतोंसे छूट जाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है ॥ १३ ॥

प्रजापतिरिदं सर्वं मनसैवासृजत् प्रभुः ।
तथैव देवानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे ॥ १४ ॥