महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1832, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाथवन्तश्च भवता पाण्डवा मधुसूदन ।
भवन्तं प्लवमासाद्य तीर्णाः स्म कुरुसागरम् ॥ ७ ॥
‘मधुसूदन! हम सभी पाण्डव आपसे सनाथ हैं, आपको ही नौकारूप पाकर हमलोग कौरवसेनारूपी समुद्रसे पार हुए हैं ॥ ७ ॥
विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसत्तम ।
तथा त्वामभिजानामि यथा चाहं भवन्मतः ॥ ८ ॥
विश्वकर्मन्! आपको नमस्कार है। विश्वात्मन्! आप सम्पूर्ण विश्वमें सबसे श्रेष्ठ हैं। मैं आपको उसी तरह जानता हूँ, जिस तरह आप मुझे समझते हैं ॥ ८ ॥
त्वत्तेजः सम्भवो नित्यं भूतात्मा मधुसूदन ।
रतिः क्रीडामयी तुभ्यं माया ते रोदसी विभो ॥ ९ ॥
‘मधुसूदन! आपके ही तेजसे सदा सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति होती है। आप ही सब प्राणियोंके आत्मा हैं। प्रभो! नाना प्रकारकी लीलाएँ आपकी रति (मनोरंजन) हैं। आकाश और पृथिवी आपकी माया है ॥ ९ ॥
त्वयि सर्वमिदं विश्वं यदिदं स्थाणु जङ्गमम् ।
त्वं हि सर्व विकुरुषे भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ १० ॥
‘यह जो स्थावर-जंगमरूप जगत् है, सब आपहीमें प्रतिष्ठित है। आप ही चार प्रकारके समस्त प्राणिसमुदायकी सृष्टि करते हैं ॥ १० ॥
पृथिवीं चान्तरिक्षं च द्यां चैव मधुसूदन ।
हसितं तेऽमला ज्योत्स्ना ऋतवश्चेन्द्रियाणि ते ॥ ११ ॥
‘मधुसूदन! पृथिवी, अन्तरिक्ष और आकाशकी सृष्टि भी आपने ही की है। निर्मल चाँदनी आपका हास्य है और ऋतुएँ आपकी इन्द्रियाँ हैं ॥ ११ ॥
प्राणो वायुः सततगः क्रोधो मृत्युः सनातनः ।
प्रसादे चापि पद्मा श्रीर्नित्यं त्वयि महामते ॥ १२ ॥
‘सदा चलनेवाली वायु प्राण है, क्रोध सनातन मृत्यु है। महामते! आपके प्रसादमें लक्ष्मी विराजमान हैं। आपके वक्षःस्थलमें सदा ही श्रीजीका निवास है ॥ १२ ॥
रतिस्तुष्टिर्धृतिः क्षान्तिर्मतिः कान्तिश्चराचरम् ।
त्वमेवेह युगान्तेषु निधनं प्रोच्यसेऽनघ ॥ १३ ॥
‘अनघ! आपमें ही रति, तुष्टि, धृति, क्षान्ति, मति, कान्ति और चराचर जगत् है। आप ही युगान्तकालमें प्रलय कहे जाते हैं ॥ १३ ॥
सुदीर्घेणापि कालेन न ते शक्या गुणा मया ।
आत्मा च परमात्मा च नमस्ते नलिनेक्षण ॥ १४ ॥
‘दीर्घकालतक गणना करनेपर भी आपके गुणोंका पार पाना असम्भव है। आप ही आत्मा और परमात्मा हैं। कमलनयन! आपको नमस्कार है ॥ १४ ॥