भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1838, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1838

स्तथैव सर्वैर्विदुरादिभिस्तथा । विनिर्ययौ नागपुराद् गदाग्रजो रथेन दिव्येन चतुर्भुजः स्वयम् ॥ ५४ ॥ कुन्तीसे भलीभाँति अभिनन्दित हो विदुर आदि सब लोगोंसे सत्कारपूर्वक विदा ले चार भुजाधारी भगवान् श्रीकृष्ण अपने दिव्य रथद्वारा हस्तिनापुरसे बाहर निकले ॥ ५४ ॥

रथे सुभद्रामधिरोप्य भाविनीं युधिष्ठिरस्यानुमते जनार्दनः । पितृष्वसुश्चापि तथा महाभुजो विनिर्ययौ पौरजनाभिसंवृतः ॥ ५५ ॥ बुआ कुन्ती तथा राजा युधिष्ठिरकी आज्ञासे भाविनी सुभद्राको भी रथपर बिठाकर महाबाहु जनार्दन पुरवासियोंसे घिरे हुए नगरसे बाहर निकले ॥ ५५ ॥

तमन्वयाद् वानरवर्यकेतनः ससात्यकिर्मार्द्रवतीसुतावपि । अगाधबुद्धिर्विदुरश्च माधवं स्वयं च भीमो गजराजविक्रमः ॥ ५६ ॥ उस समय उन माधवके पीछे कपिध्वज अर्जुन, सात्यकि, नकुल-सहदेव, अगाधबुद्धि विदुर और गजराजके समान पराक्रमी स्वयं भीमसेन भी कुछ दूरतक पहुँचानेके लिये गये ॥ ५६ ॥

निवर्तयित्वा कुरुराष्ट्रवर्धनां- स्ततः स सर्वान् विदुरं च वीर्यवान् । जनार्दनो दारुकमाह सत्वरः प्रचोदयाश्वानिति सात्यकिं तथा ॥ ५७ ॥ तदनन्तर पराक्रमी श्रीकृष्णने कौरवराज्यकी वृद्धि करनेवाले उन समस्त पाण्डवों तथा विदुरजीको लौटाकर दारुक तथा सात्यकिसे कहा—‘अब घोड़ोंको जोरसे हाँको’ ॥ ५७ ॥

ततो ययौ शत्रुगणप्रमर्दनः शिनिप्रवीरानुगतो जनार्दनः । यथा निहत्यारिगणं शतक्रतु- र्दिवं तथाऽऽनर्तपुरीं प्रतापवान् ॥ ५८ ॥ तत्पश्चात् शिनिवीर सात्यकिको साथ लिये शत्रुदलमर्दन प्रतापी श्रीकृष्ण आनर्तपुरी द्वारकाकी ओर उसी प्रकार चल दिये, जैसे प्रतापी इन्द्र अपने शत्रुसमुदायका संहार करके स्वर्गमें जा रहे हों ॥ ५८ ॥