महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1850, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंविस्मयं च ययौ विप्रस्तं दृष्ट्वा परमेश्वरम् ॥ ६ ॥
उसके सब ओर मुख था और वह सम्पूर्ण आकाशको घेरकर खड़ा था। भगवान् विष्णुके उस अद्भुत एवं उत्कृष्ट वैष्णव रूपको देखकर उन परमेश्वरकी ओर दृष्टिपात करके ब्रह्मर्षि उत्तंकको बड़ा विस्मय हुआ ॥ ६ ॥
उत्तङ्क उवाच
(नमो नमस्ते सर्वात्मन् नारायण परात्पर ।
परमात्मन् पद्मनाभ पुण्डरीकाक्ष माधव ॥
**उत्तंक बोले—**सर्वात्मन्! परात्पर नारायण! आपको बारंबार नमस्कार है। परमात्मन्! पद्मनाभ! पुण्डरीकाक्ष! माधव! आपको नमस्कार है ।।
हिरण्यगर्भरूपाय संसारोत्तारणाय च।
पुरुषाय पुराणाय चान्तर्यामाय ते नमः ॥
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा आपके ही स्वरूप हैं। आप संसार-सागरसे पार उतारनेवाले हैं। आप ही अन्तर्यामी पुराण-पुरुष हैं। आपको नमस्कार है ।।
अविद्यातिमिरादित्यं भवव्याधिमहौषधिम् ।
संसारार्णवपारं त्वां प्रणमामि गतिर्भव ॥
आप अविद्यारूपी अन्धकारको मिटानेवाले सूर्य, संसाररूपी रोगके महान् औषध तथा भवसागरसे पार करनेवाले हैं। आपको प्रणाम करता हूँ। आप मेरे आश्रय-दाता हों ।।
सर्ववेदैकवेद्याय सर्वदेवमयाय च।
वासुदेवाय नित्याय नमो भक्तप्रियाय ते ॥
आप सम्पूर्ण वेदोंके एकमात्र वेद्यतत्त्व हैं। सम्पूर्ण देवता आपके ही स्वरूप हैं तथा आप भक्तजनोंको अत्यन्त प्रिय हैं। आप नित्यस्वरूप भगवान् वासुदेवको नमस्कार है ।।
दयया दुःखमोहान्मां समुद्धर्तुमिहार्हसि ।
कर्मभिर्बहुभिः पापैर्बद्धं पाहि जनार्दन ॥)
जनार्दन! आप स्वयं ही दया करके दुःखजनित मोहसे मेरा उद्धार करें। मैं बहुत-से पाप-कर्मोंद्वारा बँधा हुआ हूँ। आप मेरी रक्षा करें ।।
विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव ।
पद्भ्यां ते पृथिवी व्याप्ता शिरसा चावृतं नभः ॥ ७ ॥
विश्वकर्मन्! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्तिके स्थानभूत विश्वात्मन्! आपके दोनों पैरोंसे पृथ्वी और सिरसे आकाश व्याप्त है ।। ७ ।।
द्यावापृथिव्योर्यन्मध्यं जठरेण तवावृतम् ।
भुजाभ्यामावृताश्चाशास्त्वमिदं सर्वमच्युत ॥ ८ ॥