भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 186

हैं ॥ १६४ ॥ वादको गायनश्चैव सहस्रशतलोचनः । एकवक्त्रो द्विवक्त्रश्च त्रिवक्त्रोऽनेकवक्त्रकः ॥ १६५ ॥ वे बाजा बजानेवाले और गीत गानेवाले हैं। उनके लाखों नेत्र हैं। वे एकमुख, द्विमुख, त्रिमुख और अनेक मुखवाले हैं ॥ १६५ ॥ तद्भक्तस्तद्गतो नित्यं तन्निष्ठस्तत्परायणः । भज पुत्र महादेवं ततः प्राप्स्यसि चेप्सितम् ॥ १६६ ॥ बेटा! तुम उन्हींके भक्त बनकर उन्हींमें आसक्त रहो। सदा उन्हींपर निर्भर रहो और उन्हींके शरणागत होकर महादेवजीका निरन्तर भजन करते रहो। इससे तुम्हें मनोवाञ्छित वस्तुकी प्राप्ति होगी ॥ १६६ ॥ जनन्यास्तद् वचः श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन् । मम भक्तिर्महादेवे नैष्ठिकी समपद्यत ॥ १६७ ॥ शत्रुसूदन श्रीकृष्ण! माताका वह उपदेश सुनकर तभीसे महादेवजीके प्रति मेरी सुदृढ़ भक्ति हो गयी ॥ ततोऽहं तप आस्थाय तोषयामास शङ्करम् । एकं वर्षसहस्रं तु वामाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ॥ १६८ ॥ तदनन्तर मैंने तपस्याका आश्रय ले भगवान् शंकरको संतुष्ट किया। एक हजार वर्षतक केवल बायें पैरके अँगूठेके अग्रभागके बलपर मैं खड़ा रहा ॥ १६८ ॥ एकं वर्षशतं चैव फलाहारस्ततोऽभवम् । द्वितीयं शीर्णपर्णाशी तृतीयं चाम्बुभोजनः ॥ १६९ ॥ पहले तो एक सौ वर्षोंतक मैं फलाहारी रहा। दूसरे शतकमें गिरे-पड़े सूखे पत्ते चबाकर रहा और तीसरे शतकमें केवल जल पीकर ही प्राण धारण करता रहा ॥ १६९ ॥ शतानि सप्त चैवाहं वायुभक्षस्तदाभवम् । एकं वर्षसहस्रं तु दिव्यमाराधितो मया ॥ १७० ॥ फिर शेष सात सौ वर्षोंतक केवल हवा पीकर रहा। इस प्रकार मैंने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक उनकी आराधना की ॥ १७० ॥ ततस्तुष्टो महादेवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः । एकभक्त इति ज्ञात्वा जिज्ञासां कुरुते तदा ॥ १७१ ॥ तदनन्तर सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी भगवान् महादेव मुझे अपना अनन्यभक्त जानकर संतुष्ट हुए और मेरी परीक्षा लेने लगे ॥ १७१ ॥ शक्ररूपं स कृत्वा तु सर्वैर्देवगणैर्वृतः । सहस्राक्षस्तदा भूत्वा वज्रपाणिर्महायशाः ॥ १७२ ॥