भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1868, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1868

सौदास बोले—ब्रह्मन्! क्षत्रियलोग सृष्टिके प्रारम्भकालसे ब्राह्मणोंकी पूजा करते आ रहे हैं तथापि ब्राह्मणोंकी ओरसे भी क्षत्रियोंके लिये बहुत-से दोष प्रकट हो जाते हैं ॥ ५ ॥
सोऽहं द्विजेभ्यः प्रणतो विप्राद् दोषमवाप्तवान् ।
गतिमन्यां न पश्यामि मदयन्तीसहायवान् ॥ ६ ॥
मैं सदा ही ब्राह्मणोंको प्रणाम किया करता था, किंतु एक ब्राह्मणके ही शापसे मुझे यह दोष—यह दुर्गति प्राप्त हुई है। मैं मदयन्तीके साथ यहाँ रहता हूँ, मुझे इस दुर्गतिसे छुटकारा पानेका कोई उपाय नहीं दिखायी देता ॥ ६ ॥
न चान्यामपि पश्यामि गतिं गतिमतां वर ।
स्वर्गद्वारस्य गमने स्थाने चेह द्विजोत्तम ॥ ७ ॥
जंगम प्राणियोंमें श्रेष्ठ विप्रवर! अब इस लोकमें रहकर सुख पाना और परलोकमें स्वर्गीय सुख भोगनेके लिये मुझे दूसरी कोई गति नहीं दीख पड़ती ॥ ७ ॥
न हि राज्ञा विशेषेण विरुद्धेन द्विजातिभिः ।
शक्यं हि लोके स्थातुं वै प्रेत्य वा सुखमेधितुम् ॥ ८ ॥
कोई भी राजा विशेषरूपसे ब्राह्मणोंके साथ विरोध करके न तो इसी लोकमें चैनसे रह सकता है और न परलोकमें ही सुख पा सकता है। यही मेरे गूढ़ संदेशका तात्पर्य है ॥ ८ ॥
तदिष्टे ते मया दत्ते एते स्वे मणिकुण्डले ।
यः कृतस्तेऽद्य समयः सफलं तं कुरुष्व मे ॥ ९ ॥
अच्छा अब आपकी इच्छाके अनुसार ये अपने मणिमय कुण्डल मैंने आपको दे दिये। अब आपने जो प्रतिज्ञा की है, वह सफल कीजिये ॥ ९ ॥

उत्तङ्क उवाच
राजंस्तथैह कर्तास्मि पुनरेष्यामि ते वशम् ।
प्रश्नं च कंचित् प्रष्टुं त्वां निवृत्तोऽस्मि परंतप ॥ १० ॥
उत्तंकने कहा—राजन्! शत्रुसंतापी नरेश! मैं अपनी प्रतिज्ञाका पालन करूँगा, पुनः आपके अधीन हो जाऊँगा; किंतु इस समय एक प्रश्न पूछनेके लिये आपके पास लौटकर आया हूँ ॥ १० ॥

सौदास उवाच
ब्रूहि विप्र यथाकामं प्रतिवक्तास्मि ते वचः ।
छेत्तास्मि संशयं तेऽद्य न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ ११ ॥
सौदासने कहा—विप्रवर! आप इच्छानुसार प्रश्न कीजिये। मैं आपकी बातका उत्तर दूँगा। आपके मनमें जो भी संदेह होगा अभी उसका निवारण करूँगा। इसमें मुझे कुछ भी विचार करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी ॥ ११ ॥

उत्तङ्क उवाच

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व · पृष्ठ 1868, कुल 2566 में से · BharatKosha