महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1871, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्पके द्वारा कुण्डलोंका अपहरण होता देख उत्तंक मुनि उद्विग्न हो उठे और अत्यन्त क्रोधमें भरकर वृक्षसे कूद पड़े। आकर एक काठका डंडा हाथमें ले उसीसे उस बाँबीको खोदने लगे ॥ २६-२७ ॥
अहानि त्रिंशदव्यग्रः पञ्च चान्यानि भारत । क्रोधामर्षाभिसंतप्तस्तदा ब्राह्मणसत्तमः ॥ २८ ॥
भरतनन्दन! ब्राह्मणशिरोमणि उत्तंक क्रोध और अमर्षसे संतप्त हो लगातार पैंतीस दिनोंतक बिना किसी घबराहटके बिल खोदनेके कार्यमें जुटे रहे ॥ २८ ॥
तस्य वेगमसह्यं तमसंहन्ती वसुन्धरा । दण्डकाष्ठाभिनुन्नाङ्गी चचाल भृशमाकुला ॥ २९ ॥
उनके उस असह्य वेगको पृथ्वी भी नहीं सह सकी। वह डंडेकी चोटसे घायल एवं अत्यन्त व्याकुल होकर डगमगाने लगी ॥ २९ ॥
ततः खनत एवाथ विप्रर्षेर्धरणीतलम् । नागलोकस्य पन्थानं कर्तुकामस्य निश्चयात् ॥ ३० ॥ रथेन हरियुक्तेन तं देशमुपजग्मिवान् । वज्रपाणिर्महातेजास्तं ददर्श द्विजोत्तमम् ॥ ३१ ॥
उत्तंक नागलोकमें जानेका मार्ग बनानेके लिये निश्चय करके धरती खोदते ही जा रहे थे कि महातेजस्वी वज्रधारी इन्द्र घोड़े जुते हुए रथपर बैठकर उस स्थानपर आ पहुँचे और विप्रवर उत्तंकसे मिले ॥ ३०-३१ ॥
वैशम्पायन उवाच
स तु तं ब्राह्मणो भूत्वा तस्य दुःखेन दुःखितः । उत्तङ्कमब्रवीत् वाक्यं नैतच्छक्यं त्वयेति वै ॥ ३२ ॥ इतो हि नागलोको वै योजनानि सहस्रशः । न दण्डकाष्ठसाध्यं च मन्ये कार्यमिदं तव ॥ ३३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इन्द्र उत्तंकके दुःखसे दुःखी थे। अतः ब्राह्मणका वेष बनाकर उनसे बोले—'ब्रह्मन्! यह काम तुम्हारे वशका नहीं है। नागलोक यहाँसे हजारों योजन दूर है। इस काठके डंडेसे वहाँका रास्ता बने, यह कार्य सधनेवाला नहीं जान पड़ता' ॥ ३२-३३ ॥