भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1873, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1873

जनमेजय! उस वज्रके प्रहारसे विदीर्ण होकर पृथ्वीने नागलोकका रास्ता प्रकट कर दिया ।। ३६ ।। स तेन मार्गेण तदा नागलोकं विवेश ह । ददर्श नागलोकं च योजनानि सहस्रशः ।। ३७ ।। उसी मार्गसे उन्होंने नागलोकमें प्रवेश किया और देखा कि नागोंका लोक सहस्रों योजन विस्तृत है ।। ३७ ।। प्राकारनिचयैर्दिव्यैर्मणिमुक्तास्वंलकृतैः । उपपन्नं महाभाग शातकुम्भमयैस्तथा ।। ३८ ।। महाभाग! उसके चारों ओर दिव्य परकोटे बने हुए हैं; जो सोनेकी ईंटोंसे बने हुए हैं और मणि-मुक्ताओंसे अलंकृत हैं ।। ३८ ।। वापीः स्फटिकसोपाना नदीश्च विमलोदकाः । ददर्श वृक्षांश्च बहून् नानाद्विजगणायुतान् ।। ३९ ।। वहाँ स्फटिक मणिकी बनी हुई सीढ़ियोंसे सुशोभित बहुत-सी बावडियों, निर्मल जलवाली अनेकानेक नदियों और विहगवृन्दसे विभूषित बहुत-से मनोहर वृक्षोंको भी उन्होंने देखा ।। ३९ ।। तस्य लोकस्य च द्वारं स ददर्श भृगूद्वहः । पञ्चयोजनविस्तारमायतं शतयोजनम् ।। ४० ।। भृगुकुलतिलक उत्तंकने नागलोकका बाहरी दरवाजा देखा, जो सौ योजन लंबा और पाँच योजन चौड़ा था ।। ४० ।। नागलोकमुत्तङ्कस्तु प्रेक्ष्य दीनोऽभवत् तदा । निराशश्चाभवत् तत्र कुण्डलाहरणे पुनः ।। ४१ ।। नागलोककी वह विशालता देखकर उत्तंक मुनि उस समय दीन—हतोत्साह हो गये। अब उन्हें फिर कुण्डल पानेकी आशा नहीं रही ।। ४१ ।। तत्र प्रोवाच तुरगस्तं कृष्णश्वेतवालधिः । ताम्रास्यनेत्रः कौरव्य प्रज्वलन्निव तेजसा ।। ४२ ।। इसी समय उनके पास एक घोड़ा आया, जिसकी पूँछके बाल काले और सफेद थे। उसके नेत्र और मुँह लाल रंगके थे। कुरुनन्दन! वह अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था ।। ४२ ।। धमस्वापानमेतन्मे ततस्त्वं विप्र लप्स्यसे । ऐरावतसुतेनेह तवानीते हि कुण्डले ।। ४३ ।। उसने उत्तंकसे कहा—विप्रवर! तुम मेरे इस अपान मार्गमें फूँक मारो। ऐसा करनेसे ऐरावतके पुत्रने जो तुम्हारे दोनों कुण्डल लाये हैं, वे तुम्हें मिल जायँगे ।। ४३ ।। मा जुगुप्सां कृथाः पुत्र त्वमत्रार्थे कथंचन ।