महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1875, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइत्युक्तस्तु तथाकार्षीदुत्तङ्कश्चित्रभानुना ।
घृतार्चिः प्रीतिमांश्चापि प्रजज्वाल दिधक्षया ॥ ४८ ॥
अग्निदेवके ऐसा कहनेपर उतंकने उनकी आज्ञाका पालन किया। तब घृतमयी अर्चिवाले अग्निदेव प्रसन्न होकर नागलोकको जला डालनेकी इच्छासे प्रज्वलित हो उठे ॥ ४८ ॥
ततोऽस्य रोमकूपेभ्यो ध्म्यतस्तत्र भारत ।
घनः प्रादुरभूद् धूमो नागलोकभयावहः ॥ ४९ ॥
भारत! जिस समय उतंकने फूँक मारना आरम्भ किया, उसी समय उस अश्वरूपधारी अग्निके रोम-रोमसे घनीभूत धूम उठने लगा; जो नागलोकको भयभीत करनेवाला था ॥ ४९ ॥
तेन धूमेन महता वर्धमानेन भारत ।
नागलोके महाराज न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५० ॥
महाराज भरतनन्दन! बढ़ते हुए उस महान् धूमसे आच्छन्न हुए नागलोकमें कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ ५० ॥
हाहाकृतमभूत् सर्वमैरावतनिवेशनम् ।
वासुकिप्रमुखानां च नागानां जनमेजय ॥ ५१ ॥