भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1882, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1882

स नगो वेश्मसंकीर्णो देवलोक इवाबभौ । वीरवर! उस पर्वतपर पुण्यानुष्ठानके लिये बहुत-से गृह और आश्रम बने थे, जिनमें पुण्यात्मा पुरुष निवास करते थे। रैवतक पर्वतके उस महोत्सवमें वृष्णिवंशी वीरोंका विहार-स्थल बना हुआ था। वह गिरिप्रदेश बहुसंख्यक गृहोंसे व्याप्त होनेके कारण देवलोकके समान शोभा पाता था ।। १४ १/२ ।। तदा च कृष्णसांनिध्यमासाद्य भरतर्षभ ।। १५ ।। (स्तुवन्त्यन्तर्हिता देवा गन्धर्वाश्च सहर्षिभिः । भरतश्रेष्ठ! उस समय देवता, गन्धर्व और ऋषि अदृश्यरूपसे श्रीकृष्णके निकट आकर उनकी स्तुति करने लगे ।। १५ ।।

देवगन्धर्वा ऊचुः

साधकः सर्वधर्माणामसुराणां विनाशकः । त्वं स्रष्टा सृज्यमाधारं कारणं धर्मवेदवित् ।। त्वया यत् क्रियते देव न जानीमोऽत्र मायया । केवलं त्वाभिजानीमः शरणं परमेश्वरम् ।। ब्रह्मादीनां च गोविन्द सांनिध्यं शरणं नमः ।। देवता और गन्धर्व बोले— भगवन्! आप समस्त धर्मोंके साधक और असुरोंके विनाशक हैं। आप ही स्रष्टा, आप ही सृज्य जगत् और आप ही उसके आधार हैं। आप ही सबके कारण तथा धर्म और वेदके ज्ञाता हैं। देव! आप अपनी मायासे जो कुछ करते हैं, हमलोग उसे नहीं जान पाते हैं। हम केवल आपको जानते हैं। आप ही सबके शरणदाता और परमेश्वर हैं। गोविन्द! आप ब्रह्मा आदिको भी सामीप्य और शरण प्रदान करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ।।

वैशम्पायन उवाच

इति स्तुतेऽमानुषैश्च पूजिते देवकीसुते ।) शक्रसद्मप्रतीकाशो बभूव स हि शैलराट् । वैशम्पायनजी कहते हैं— इस प्रकार मानवेतर प्राणियों—देवताओं और गन्धर्वोंद्वारा जब देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी स्तुति और पूजा की जा रही थी, उस समय वह पर्वतराज रैवतक इन्द्रभवनके समान जान पड़ता था ।। १५ १/२ ।। ततः सम्पूज्यमानः स विवेश भवनं शुभम् ।। १६ ।। गोविन्दः सात्यकिश्चैव जगाम भवनं स्वकम् । तदनन्तर सबसे सम्मानित हो भगवान् श्रीकृष्णने अपने सुन्दर भवनमें प्रवेश किया और सात्यकि भी अपने घरमें गये ।। १६ १/२ ।। विवेश च प्रहृष्टात्मा चिरकालप्रवासतः ।। १७ ।।