महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1923, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदीजिये ॥ १३ ॥ यदि स्म धर्मराज्ञा वा भीमसेनेन वा पुनः । त्वया वा पुण्डरीकाक्ष वाक्यमुक्तमिदं भवेत् ॥ १४ ॥ अजानतीमिषीकेयं जनित्रीं हन्त्विति प्रभो । अहमेव विनष्टा स्यां नैतदेवंगते भवेत् ॥ १५ ॥ 'प्रभो! पुण्डरीकाक्ष! यदि धर्मराज अथवा आर्य भीमसेन या आपने ही ऐसा कह दिया होता कि यह सींक इस बालकको न मारकर इसकी अनजान माताको ही मार डाले, तब केवल मैं ही नष्ट हुई होती। उस दशामें यह अनर्थ नहीं होता ॥ १४-१५ ॥ गर्भस्थस्यास्य बालस्य ब्रह्मास्त्रेण निपातनम् । कृत्वा नृशंसं दुर्बुद्धिर्द्रोणिः किं फलमश्नुते ॥ १६ ॥ 'हाय! इस गर्भके बालकको ब्रह्मास्त्रसे मार डालनेका क्रूरतापूर्ण कर्म करके दुर्बुद्धि द्रोणपुत्र अश्वत्थामा कौन-सा फल पा रहा है ॥ १६ ॥ सा त्वां प्रसाद्य शिरसा याचे शत्रुनिबर्हणम् । प्राणांस्त्यक्ष्यामि गोविन्द नायं संजीवते यदि ॥ १७ ॥ 'गोविन्द! आप शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं। मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर आपको प्रसन्न करके आपसे इस बालकके प्राणोंकी भीख माँगती हूँ। यदि यह जीवित नहीं हुआ तो मैं भी अपने प्राण त्याग दूँगी ॥ १७ ॥ अस्मिन् हि बहवः साधो ये ममासन् मनोरथाः । ते द्रोणपुत्रेण हताः किं नु जीवामि केशव ॥ १८ ॥ 'साधुपुरुष केशव! इस बालकपर मैंने जो बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँध रखी थीं, द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने उन सबको नष्ट कर दिया। अब मैं किसलिये जीवित रहूँ? ॥ १८ ॥ आसीन्मम मतिः कृष्ण पुत्रोत्सङ्गा जनार्दन । अभिवादयिष्ये हृष्टेति तदिदं वितथीकृतम् ॥ १९ ॥ 'श्रीकृष्ण! जनार्दन! मेरी बड़ी आशा थी कि अपने इस बच्चेको गोदमें लेकर मैं प्रसन्नतापूर्वक आपके चरणोंमें अभिवादन करूँगी; किंतु अब वह व्यर्थ हो गयी ॥ १९ ॥ चपलाक्षस्य दायादे मृतेऽस्मिन् पुरुषर्षभ । विफला मे कृताः कृष्ण हृदि सर्वे मनोरथाः ॥ २० ॥ 'पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण! चंचल नेत्रोंवाले पतिदेवके इस पुत्रकी मृत्यु हो जानेसे मेरे हृदयके सारे मनोरथ निष्फल हो गये ॥ २० ॥ चपलाक्षः किलातीव प्रियस्ते मधुसूदन । सुतं पश्य त्वमस्यैनं ब्रह्मास्त्रेण निपातितम् ॥ २१ ॥ 'मधुसूदन! सुनती हूँ कि चंचल नेत्रोंवाले अभिमन्यु आपको बहुत ही प्रिय थे। उन्हींका बेटा आज ब्रह्मास्त्रकी मारसे मरा पड़ा है। आप इसे आँख भरकर देख लीजिये ॥ २१ ॥