भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1926, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1926

दुर्मरं प्राणिनां वीर कालेऽप्राप्ते कथंचन ॥ ७ ॥
याहं त्वया विनाद्येह पत्या पुत्रेण चैव ह ।
मर्त्तव्ये सति जीवामि हतस्वस्तिरकिंचना ॥ ८ ॥
'वत्स! परलोकमें जाकर तू अपने पितासे मेरी यह बात कहना—'वीर! अन्तकाल आये बिना प्राणियोंके लिये किसी तरह भी मरना बड़ा कठिन होता है। तभी तो मैं यहाँ आप-जैसे पति तथा इस पुत्रसे बिछुड़कर भी जब कि मुझे मर जाना चाहिये, अबतक जी रही हूँ; मेरा सारा मंगल नष्ट हो गया है। मैं अकिंचन हो गयी हूँ' ॥

अथवा धर्मराज्ञाहमनुज्ञाता महाभुज ।
भक्षयिष्ये विषं घोरं प्रवेक्ष्ये वा हुताशनम् ॥ ९ ॥
'महाबाहो! अब मैं धर्मराजकी आज्ञा लेकर भयानक विष खा लूँगी अथवा प्रज्वलित अग्निमें समा जाऊँगी ॥ ९ ॥

अथवा दुर्मरं तात यदिदं मे सहस्रधा ।
पतिपुत्रविहीनाया हृदयं न विदीर्यते ॥ १० ॥
'तात! जान पड़ता है, मनुष्यके लिये मरना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि पति और पुत्रसे हीन होनेपर भी मेरे इस हृदयके हजारों टुकड़े नहीं हो रहे हैं ॥ १० ॥

उत्तिष्ठ पुत्र पश्येमां दुःखितां प्रपितामहीम् ।
आर्त्तामुपप्लुतां दीनां निमग्नां शोकसागरे ॥ ११ ॥
'बेटा! उठकर खड़ा हो जा। देख! ये तेरी परदादी (कुन्ती) कितनी दुखी हैं। ये तेरे लिये आर्त, व्यथित एवं दीन होकर शोकके समुद्रमें डूब गयी हैं ॥ ११ ॥

आर्यां च पश्य पाञ्चालीं सात्वतीं च तपस्विनीम् ।
मां च पश्य सुदुःखार्त्तां व्याधविद्धां मृगीमिव ॥ १२ ॥
'आर्या पांचाली (द्रौपदी)-की ओर देख, अपनी दादी तपस्विनी सुभद्राकी ओर दृष्टिपात कर और व्याधके बाणोंसे बिंधी हुई हरिणीकी भाँति अत्यन्त दुःखसे आर्त हुई मुझ अपनी माँको भी देख ले ॥ १२ ॥

उत्तिष्ठ पश्य वदनं लोकनाथस्य धीमतः ।
पुण्डरीकपलाशाक्षं पुरैव चपलेक्षणम् ॥ १३ ॥
'बेटा! उठकर खड़ा हो जा और बुद्धिमान् जगदीश्वर श्रीकृष्णके कमलदलके समान नेत्रोंवाले मुखारविन्दकी शोभा निहार, ठीक उसी तरह जैसे पहले मैं चंचल नेत्रोंवाले तेरे पिताका मुँह निहारा करती थी' ॥ १३ ॥

एवं विप्रलपन्तीं तु दृष्ट्वा निपतितां पुनः ।
उत्तरां तां स्त्रियं सर्वाः पुनरुत्थापयंस्ततः ॥ १४ ॥
इस प्रकार विलाप करती हुई उत्तराको पुनः पृथ्वीपर पड़ी देख सब स्त्रियोंने उसे फिर उठाकर बिठाया ॥ १४ ॥