भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1936, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1936

‘दशार्हनन्दन! आप ही इस यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करें; क्योंकि आप हमारे परम गुरु हैं। आपके यज्ञानुष्ठान पूर्ण कर लेनेपर निश्चय ही हमारे सब पाप नष्ट हो जायँगे ॥ २१ ॥ त्वं हि यज्ञोऽक्षरः सर्वस्त्वं धर्मस्त्वं प्रजापतिः । त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ॥ २२ ॥ ‘आप ही यज्ञ, अक्षर, सर्वस्वरूप, धर्म, प्रजापति एवं सम्पूर्ण भूतोंकी गति हैं—यह मेरी निश्चित धारणा है’ ॥ २२ ॥

वासुदेव उवाच त्वमेवैतन्महाबाहो वक्तुमर्हस्यरिंदम । त्वं गतिः सर्वभूतानामिति मे निश्चिता मतिः ॥ २३ ॥ **भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**महाबाहो! शत्रुदमन नरेश! आप ही ऐसी बात कह सकते हैं। मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके अवलम्ब हैं ॥ २३ ॥ त्वं चाद्य कुरुवीराणां धर्मेण हि विराजसे । गुणीभूताः स्म ते राजंस्त्वं नो राजा गुरुर्मतः ॥ २४ ॥ राजन्! समस्त कौरववीरोंमें एकमात्र आप ही धर्मसे सुशोभित होते हैं। हमलोग आपके अनुयायी हैं और आपको अपना राजा एवं गुरु मानते हैं ॥ २४ ॥ यजस्व मदनुज्ञातः प्राप्य एष क्रतुस्त्वया । युनक्तु नो भवान् कार्ये यत्र वाञ्छसि भारत ॥ २५ ॥ इसलिये भारत! आप हमारी अनुमतिसे स्वयं ही इस यज्ञका अनुष्ठान कीजिये तथा हमलोगोंमेंसे जिसको जिस कामपर लगाना चाहते हों, उसे उस कामपर लगनेकी आज्ञा दीजिये ॥ २५ ॥ सत्यं ते प्रतिजानामि सर्वं कर्तास्मि तेऽनघ । भीमसेनार्जुनौ चैव तथा माद्रवतीसुतौ । इष्टवन्तो भविष्यन्ति त्वयीष्टवति पार्थिवे ॥ २६ ॥ निष्पाप नरेश! मैं आपके सामने सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप जो कुछ कहेंगे, वह सब करूँगा। आप राजा हैं, आपके द्वारा यज्ञ होनेपर भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवको भी यज्ञानुष्ठानका फल मिल जायगा ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि कृष्णव्यासानुज्ञायामेकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्ण और व्यासकी युधिष्ठिरको यज्ञ करनेके लिये आज्ञाविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७१ ॥