महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1940, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘कुरुनन्दन! महायशस्वी बुद्धिमान् सहदेव कुटुम्ब-पालनसम्बन्धी समस्त कार्योंकी देखभाल करेंगे’॥ २० ॥ तत् तु सर्वं यथान्यायमुक्तः कुरुकुलोद्वहः । चकार फाल्गुनं चापि संदेश हयं प्रति ॥ २१ ॥ व्यासजीके इस प्रकार बतलानेपर कुरुकुलतिलक युधिष्ठिरने सारा कार्य उसी प्रकार यथोचित रीतिसे सम्पन्न किया और अर्जुनको बुलाकर घोड़ेकी रक्षाके लिये इस प्रकार आदेश दिया॥ २१ ॥
युधिष्ठिर उवाच एह्यर्जुन त्वया वीर हयोऽयं परिपाल्यताम् । त्वमर्हो रक्षितुं ह्येनं नान्यः कश्चन मानवः ॥ २२ ॥ युधिष्ठिर बोले—वीर अर्जुन! यहाँ आओ, तुम इस घोड़ेकी रक्षा करो; क्योंकि तुम्हीं इसकी रक्षा करनेके योग्य हो। दूसरा कोई मनुष्य इसके योग्य नहीं है॥ २२ ॥ ये चापि त्वां महाबाहो प्रत्युद्यान्ति नराधिपाः । तैर्विग्रहो यथा न स्यात् तथा कार्यं त्वयानघ ॥ २३ ॥ महाबाहो! निष्पाप अर्जुन! अश्वकी रक्षाके समय जो राजा तुम्हारे सामने आवें, उनके साथ भरसक युद्ध न करना पड़े, ऐसी चेष्टा तुम्हें करनी चाहिये॥ २३ ॥ आख्यातव्यश्च भवता यज्ञोऽयं मम सर्वशः । पार्थिवेभ्यो महाबाहो समये गम्यतामिति ॥ २४ ॥ महाबाहो! मेरे इस यज्ञका समाचार तुम्हें समस्त राजाओंको बताना चाहिये और उनसे यह कहना चाहिये कि आपलोग यथासमय यज्ञमें पधारें॥ २४ ॥
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा स धर्मात्मा भ्रातरं सव्यसाचिनम् । भीमं च नकुलं चैव पुरगुप्तौ समादधत् ॥ २५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! अपने भाई सव्यसाची अर्जुनसे ऐसा कहकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने भीमसेन और नकुलको नगरकी रक्षाका भार सौंप दिया॥ २५ ॥ कुटुम्बतन्त्रे च तदा सहदेवं युधां पतिम् । अनुमान्य महीपालं धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ॥ २६ ॥ फिर महाराज धृतराष्ट्रकी सम्मति लेकर युधिष्ठिरने योद्धाओंके स्वामी सहदेवको कुटुम्ब-पालन-सम्बन्धी कार्यमें नियुक्त कर दिया॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि यज्ञसामग्रीसम्पादने द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥