भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1954, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1954

आह्वयामास बीभत्सुं बाल्यान्मोहाच्च संयुगे ॥ ८ ॥
उसने मस्तकपर श्वेत छत्र धारण कर रखा था। सेवक श्वेत चवँर झुला रहे थे। पाण्डव महारथी पार्थके पास पहुँचकर उस महारथी नरेशने बालचापल्य और मूर्खताके कारण उन्हें युद्धके लिये ललकारा ॥ ७-८ ॥
स वारणं नगप्रख्यं प्रभिन्नकरटामुखम् ।
प्रेषयामास संक्रुद्धः श्वेताश्वं प्रति पार्थिवः ॥ ९ ॥
क्रोधमें भरे हुए राजा वज्रदत्तने श्वेतवाहन अर्जुनकी ओर अपने पर्वताकार विशालकाय गजराजको, जिसके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही थी, बढ़ाया ॥ ९ ॥
विक्षरन्तं महामेघं परवारणवारणम् ।
शास्त्रवत् कल्पितं संख्ये विवशं युद्धदुर्मदम् ॥ १० ॥
वह महान् मेघके समान मदकी वर्षा करता था। शत्रुपक्षके हाथियोंको रोकनेमें समर्थ था। उसे शास्त्रीय विधिके अनुसार युद्धके लिये तैयार किया गया था। वह स्वामीके अधीन रहनेवाला और युद्धमें दुर्धर्ष था ॥ १० ॥
प्रचोद्यमानः स गजस्तेन राज्ञा महाबलः ।
तदाङ्कुशेन विबभावुत्पतिष्यन्निवाम्बरम् ॥ ११ ॥
राजा वज्रदत्तने जब अंकुशसे मारकर उस महाबली हाथीको आगे बढ़नेके लिये प्रेरित किया, तब वह इस तरह आगेकी ओर झपटा, मानो वह आकाशमें उड़ जायगा ॥ ११ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य क्रुद्धो राजन् धनंजयः ।
भूमिष्ठो वारणगतं योधयामास भारत ॥ १२ ॥
राजन्! भरतनन्दन! उसे इस प्रकार आक्रमण करते देख अर्जुन कुपित हो उठे। वे पृथ्वीपर स्थित होते हुए भी हाथीपर चढ़े हुए वज्रदत्तके साथ युद्ध करने लगे ॥ १२ ॥
वज्रदत्तस्ततः क्रुद्धो मुमोचाशु धनंजये ।
तोमरानग्निसंकाशान् शलभानिव वेगितान् ॥ १३ ॥
उस समय वज्रदत्तने कुपित होकर तुरंत ही अर्जुनपर अग्निके समान प्रज्वलित तोमर चलाये, जो वेगसे उड़नेवाले पतंगोंके समान जान पड़ते थे ॥ १३ ॥
अर्जुनस्तानसम्प्राप्तान् गाण्डीवप्रभवैः शरैः ।
द्विधा त्रिधा च चिच्छेद ख एव खगमैस्तदा ॥ १४ ॥
वे तोमर अभी पास भी नहीं आने पाये थे कि अर्जुनने गाण्डीव धनुषद्वारा छोड़े गये आकाशचारी बाणोंद्वारा आकाशमें ही एक-एक तोमरके दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर डाले ॥ १४ ॥
स तान् दृष्ट्वा तथा छिन्नांस्तोमरान् भगदत्तजः ।
इषूनसक्तांस्त्वरितः प्राहिणोत् पाण्डवं प्रति ॥ १५ ॥