महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1956, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्सप्ततितमोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा वज्रदत्तकी पराजय
वैशम्पायन उवाच
एवं त्रिरात्रमभवत् तद् युद्धं भरतर्षभ ।
अर्जुनस्य नरेन्द्रेण वृत्रेणेव शतक्रतोः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ! जैसे इन्द्रका वृत्रासुरके साथ युद्ध हुआ था, उसी प्रकार अर्जुनका राजा वज्रदत्तके साथ तीन दिन तीन रात युद्ध होता रहा ॥ १ ॥
ततश्चतुर्थे दिवसे वज्रदत्तो महाबलः ।
जहास सस्वनं हासं वाक्यं चेदमथाब्रवीत् ॥ २ ॥
तदनन्तर चौथे दिन महाबली वज्रदत्त ठहाका मारकर हँसने लगा और इस प्रकार बोला— ॥ २ ॥
अर्जुनार्जुन तिष्ठस्व न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ।
त्वां निहत्य करिष्यामि पितुस्तोयं यथाविधि ॥ ३ ॥
‘अर्जुन! अर्जुन! खड़े रहो। आज मैं तुम्हें जीवित नहीं छोड़ूँगा। तुम्हें मारकर पिताका विधिपूर्वक तर्पण करूँगा ॥ ३ ॥
त्वया वृद्धो मम पिता भगदत्तः पितुः सखा ।
हतो वृद्धो मम पिता शिशुं मामद्य योधय ॥ ४ ॥
‘मेरे वृद्ध पिता भगदत्त तुम्हारे बापके मित्र थे, तो भी तुमने उनकी हत्या की। मेरे पिता बूढ़े थे, इसलिये तुम्हारे हाथसे मारे गये। आज उनका बालक मैं तुम्हारे सामने उपस्थित हूँ; मेरे साथ युद्ध करो’ ॥ ४ ॥
इत्येवमुक्त्वा संक्रुद्धो वज्रदत्तो नराधिपः ।
प्रेषयामास कौरव्य वारणं पाण्डवं प्रति ॥ ५ ॥
कुरुनन्दन! ऐसा कहकर क्रोधमें भरे हुए राजा वज्रदत्तने पुनः पाण्डुपुत्र अर्जुनकी ओर अपने हाथीको हाँक दिया ॥ ५ ॥
सम्प्रेष्यमाणो नागेन्द्रो वज्रदत्तेन धीमता ।
उत्पतिष्यन्निवाकाशमभिदुद्राव पाण्डवम् ॥ ६ ॥
बुद्धिमान् वज्रदत्तके द्वारा हाँके जानेपर वह गजराज पाण्डुपुत्र अर्जुनकी ओर इस प्रकार दौड़ा, मानो आकाशमें उड़ जाना चाहता हो ॥ ६ ॥
अग्रहस्तसमुक्तेन शीकरेण स नागराट् ।
समौक्षत गुडाकेशं शैलं नीलमिवाम्बुदः ॥ ७ ॥