भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1958, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1958

परंतु महाबाहु अर्जुनने अपने शत्रुघाती सायकोंद्वारा उन सारे बाणोंको पीछे लौटा दिया। वह एक अद्भुत-सी घटना हुई ॥ १५ ॥ ततः पुनरभिक्रुद्धो राजा प्राग्ज्योतिषाधिपः । प्रेषयामास नागेन्द्रं बलवत् पर्वतोपमम् ॥ १६ ॥ तब प्राग्ज्योतिषपुरके स्वामी राजा वज्रदत्तने अत्यन्त कुपित हो अपने पर्वताकार गजराजको पुनः बलपूर्वक आगे बढ़ाया ॥ १६ ॥ तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य बलवत् पाकशासनिः । नाराचमग्निसंकाशं प्राहिणोद् वारणं प्रति ॥ १७ ॥ उसे बलपूर्वक आक्रमण करते देख इन्द्रकुमार अर्जुनने उस हाथीके ऊपर एक अग्निके समान तेजस्वी नाराच चलाया ॥ १७ ॥ स तेन वारणो राजन् मर्मस्वभिहतो भृशम् । पपात सहसा भूमौ वज्ररुग्ण इवाचलः ॥ १८ ॥ राजन्! उस नाराचने हाथीके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी। वह वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति सहसा पृथ्वीपर ढह पड़ा ॥ १८ ॥ स पतन् शुशुभे नागो धनंजयशराहतः । विशन्निव महाशैलो महीं वज्रप्रपीडितः ॥ १९ ॥ अर्जुनके बाणोंसे घायल होकर गिरता हुआ वह हाथी ऐसी शोभा पाने लगा, मानो वज्रके आघातसे अत्यन्त पीड़ित हुआ महान् पर्वत पृथ्वीमें समा जाना चाहता हो ॥ १९ ॥ तस्मिन् निपतिते नागे वज्रदत्तस्य पाण्डवः । तं न भेतव्यमित्याह ततो भूमिगतं नृपम् ॥ २० ॥ वज्रदत्तके उस हाथीके धराशायी होते ही राजा वज्रदत्त स्वयं भी पृथ्वीपर जा पड़ा। उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुनने उससे कहा— 'राजन्! तुम्हें डरना नहीं चाहिये' ॥ २० ॥ अब्रवीद्धि महातेजाः प्रस्थितं मां युधिष्ठिरः । राजानस्ते न हन्तव्या धनंजय कथंचन ॥ २१ ॥ जब मैं घरसे प्रस्थित हुआ, उस समय महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरने मुझसे कहा— 'धनंजय! तुम्हें किसी तरह भी राजाओंका वध नहीं करना चाहिये' ॥ २१ ॥ सर्वमेतन्नरव्याघ्र भवत्येतावता कृतम् । योधाश्चापि न हन्तव्या धनंजय रणे त्वया ॥ २२ ॥ "पुरुषसिंह! इतना करनेसे सब कुछ हो जायगा। अर्जुन! तुम्हें युद्ध ठानकर योद्धाओंका वध कदापि नहीं करना चाहिये ॥ २२ ॥ वक्तव्याश्चापि राजानः सर्वे सहसुहृज्जनैः । युधिष्ठिरस्याश्वमेधो भवद्भिरनुभूयताम् ॥ २३ ॥