महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1960, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तसप्ततितमोऽध्यायः
अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध
वैशम्पायन उवाच
(जित्वा प्रसाद्य राजानं भगदत्तसुतं तदा । विसृज्य याते तुरगे सैन्धवान् प्रति भारत ॥) सैन्धवैरभवद् युद्धं ततस्तस्य किरीटिनः । हतशेषैर्महाराज हतानां च सुतैरपि ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन! महाराज भगदत्तके पुत्र राजा वज्रदत्तको पराजित और प्रसन्न करनेके पश्चात् उसे विदा करके जब अर्जुनका घोड़ा सिंधुदेशमें गया, तब महाभारत-युद्धमें मरनेसे बचे हुए सिंधुदेशीय योद्धाओं तथा मारे गये राजाओंके पुत्रोंके साथ किरीटधारी अर्जुनका घोर संग्राम हुआ ॥ १ ॥
तेऽवतीर्णमुपश्रुत्य विषयं श्वेतवाहनम् । प्रत्युद्ययुरमृष्यन्तो राजानः पाण्डवर्षभम् ॥ २ ॥ यज्ञके घोड़ेको और श्वेतवाहन अर्जुनको अपने राज्यके भीतर आया हुआ सुनकर वे सिंधुदेशीय क्षत्रिय अमर्षमें भरकर उन पाण्डवप्रवर अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ २ ॥
अश्वं च तं परामृश्य विष्यान्ते विषोपमाः । न भयं चक्रिरे पार्थाद् भीमसेनादनन्तरात् ॥ ३ ॥ वे विषके समान भयंकर क्षत्रिय अपने राज्यके भीतर आये हुए उस घोड़ेको पकड़कर भीमसेनके छोटे भाई अर्जुनसे तनिक भी भयभीत नहीं हुए ॥ ३ ॥
तेऽविदूराद् धनुष्पाणिं यज्ञियस्य हयस्य च । बीभत्सुं प्रत्यपद्यन्त पदातिनमवस्थितम् ॥ ४ ॥ यज्ञसम्बन्धी घोड़ेसे थोड़ी ही दूरपर अर्जुन हाथमें धनुष लिये पैदल ही खड़े थे। वे सभी क्षत्रिय उनके पास जा पहुँचे ॥ ४ ॥
ततस्ते तं महावीर्या राजानः पर्यवारयन् । जिगीषन्तो नरव्याघ्रं पूर्वं विनिकृता युधि ॥ ५ ॥ वे महापराक्रमी क्षत्रिय पहले युद्धमें अर्जुनसे परास्त हो चुके थे और अब उन पुरुषसिंह पार्थको जीतना चाहते थे। अतः उन सबने उन्हें घेर लिया ॥ ५ ॥
ते नामान्यपि गोत्राणि कर्माणि विविधानि च । कीर्तयन्तस्तदा पार्थं शरवर्षैरवाकिरन् ॥ ६ ॥