भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1965, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1965

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अष्टसप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनका सैन्धवोंके साथ युद्ध और दुःशलाके अनुरोधसे उसकी समाप्ति

वैशम्पायन उवाच

ततो गाण्डीवभृच्छूरो युद्धाय समुपस्थितः ।
विबभौ युधि दुर्धर्षो हिमवानचलो यथा ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुन युद्धके लिये उद्यत हो गये। वे शत्रुओंके लिये दुर्जय थे और युद्धभूमिमें हिमवान् पर्वतके समान अचल भावसे डटे रहकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ १ ॥

ततस्ते सैन्धवा योधाः पुनरेव व्यवस्थिताः ।
व्यमुञ्चन्त सुसंरब्धा शरवर्षाणि भारत ॥ २ ॥

भरतनन्दन! तदनन्तर सिन्धुदेशीय योद्धा फिरसे संगठित होकर खड़े हो गये और अत्यन्त क्रोधमें भरकर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २ ॥

तान् प्रहस्य महाबाहुः पुनरेव व्यवस्थितान् ।
ततः प्रोवाच कौन्तेयो मुमूर्षून् श्लक्ष्णया गिरा ।
युध्यध्वं परया शक्त्या यतध्वं विजये मम ॥ ३ ॥

उस समय महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुन पुनः मरनेकी इच्छासे खड़े हुए सैन्धवोंको सम्बोधित करके हँसते हुए मधुर वाणीमें बोले—‘वीरो! तुम पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करो और मुझपर विजय पानेका प्रयत्न करते रहो ॥ ३ ॥

कुरुध्वं सर्वकार्याणि महद् वो भयमागतम् ।
एष योत्स्यामि सर्वांस्तु निवार्य शरवागुराम् ॥ ४ ॥

‘तुम अपने सारे कार्य पूरे कर लो। तुमलोगोंपर महान् भय आ पहुँचा है। यह देखो—मैं तुम्हारे बाणोंका जाल छिन्न-भिन्न करके तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करनेको उद्यत हूँ ॥ ४ ॥

तिष्ठध्वं युद्धमनसो दर्पं शमयितास्मि वः ।
एतावदुक्त्वा कौरव्यो रोषाद् गाण्डीवभृत् तदा ॥ ५ ॥
ततोऽथ वचनं स्मृत्वा भ्रातुर्ज्येष्ठस्य भारत ।
न हन्तव्या रणे तात क्षत्रिया विजिगीषवः ॥ ६ ॥
जेतव्याश्चेति यत् प्रोक्तं धर्मराज्ञा महात्मना ।
चिन्तयामास स तदा फाल्गुनः पुरुषर्षभः ॥ ७ ॥