महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1987, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमेघके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाली देव-दुन्दुभियाँ बिना बजाये ही बज उठीं और आकाशमें साधुवादकी महान् ध्वनि गूँजने लगी ।। ५५ ।। उत्थाय च महाबाहुः पर्याश्वस्तो धनंजयः । बभ्रुवाहनमालिङ्ग्य समाजिघ्रत मूर्धनि ।। ५६ ।। महाबाहु अर्जुन भलीभाँति स्वस्थ होकर उठे और बभ्रुवाहनको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघने लगे ।। ५६ ।। ददर्श चापि दूरेऽस्य मातरं शोककर्शिताम् । उलूप्या सह तिष्ठन्तीं ततोऽपृच्छद् धनंजयः ।। ५७ ।। उससे थोड़ी ही दूरपर बभ्रुवाहनकी शोकाकुल माता चित्रांगदा उलूपीके साथ खड़ी थी। अर्जुनने जब उसे देखा, तब बभ्रुवाहनसे पूछा— ।। ५७ ।। किमिदं लक्ष्यते सर्वं शोकविस्मयहर्षवत् । रणाजिरममित्रघ्न यदि जानासि शंस मे ।। ५८ ।। ‘शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर पुत्र! यह सारा समरांगण शोक, विस्मय और हर्षसे युक्त क्यों दिखायी देता है? यदि जानते हो तो मुझे बताओ ।। ५८ ।। जननी च किमर्थं ते रणभूमिमुपागता । नागेन्द्रदुहिता चेयमूलूपी किमिहागता ।। ५९ ।। ‘तुम्हारी माता किसलिये रणभूमिमें आयी है? तथा इस नागराजकन्या उलूपीका आगमन भी यहाँ किसलिये हुआ है? ।। ५९ ।। जानाम्यहमिदं युद्धं त्वया मद्वचनात् कृतम् । स्त्रीणामागपने हेतुमहमिच्छामि वेदितुम् ।। ६० ।। ‘मैं तो इतना ही जानता हूँ कि तुमने मेरे कहनेसे यह युद्ध किया है; परंतु यहाँ स्त्रियोंके आनेका क्या कारण है? यह मैं जानना चाहता हूँ' ।। ६० ।। तमुवाच तथा पृष्टो मणिपूरपतिस्तदा । प्रसाद्य शिरसा विद्वानुलूपी पृच्छ्यतामियम् ।। ६१ ।। पिताके इस प्रकार पूछनेपर विद्वान् मणिपूरनरेशने पिताके चरणोंमें सिर रखकर उन्हें प्रसन्न किया और कहा—‘पिताजी! यह वृत्तान्त आप माता उलूपीसे पूछिये' ।। ६१ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे अर्जुनप्रत्युज्जीवने अशीतितमोऽध्यायः ।। ८० ।।
इस प्रकार श्रीमद्भारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वानुसरणके प्रसंगमें अर्जुनका पुनर्जीवनविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८० ।।