महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1996, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'यदि युद्धमें मेरे पिता आदि पूर्वजोंने कभी तुम्हारा स्वागत-सत्कार नहीं किया है तो आज मैं इस कमीको पूर्ण करूँगा। युद्धके मैदानमें तुम्हारा यथोचित आतिथ्य-सत्कार करूँगा। पहले मुझपर प्रहार करो, फिर मैं तुमपर प्रहार करूँगा' ।। ७ ।। इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं प्रहसन्निव पाण्डवः । विघ्नकर्ता मया वार्य इति मे व्रतमाहितम् ।। ८ ।। भ्रात्रा ज्येष्ठेन नृपते तवापि विदितं ध्रुवम् । प्रहरस्व यथाशक्ति न मन्युर्विद्यते मम ।। ९ ।। उसके ऐसा कहनेपर पाण्डुपुत्र अर्जुनने उसे हँसते हुए-से इस प्रकार उत्तर दिया—'नरेश्वर! मेरे बड़े भाईने मेरे लिये इस व्रतकी दीक्षा दिलायी है कि जो मेरे मार्गमें विघ्न डालनेको उद्यत हो, उसे रोको। निश्चय ही यह बात तुम्हें भी विदित है। अतः तुम अपनी शक्तिके अनुसार मुझपर प्रहार करो। मेरे मनमें तुमपर कोई रोष नहीं है' ।। ८-९ ।। इत्युक्तः प्राहरत् पूर्वं पाण्डवं मगधेश्वरः । किरन् शरसहस्राणि वर्षाणीव सहस्रदृक् ।। १० ।। अर्जुनके ऐसा कहनेपर मगधनरेशने पहले उनपर प्रहार किया। जैसे सहस्रनेत्रधारी इन्द्र जलकी वर्षा करते हैं, उसी प्रकार मेघसन्धि अर्जुनपर सहस्रों बाणोंकी झड़ी लगाने लगा ।। १० ।। ततो गाण्डीवभृच्छूरो गाण्डीवप्रहितैः शरैः । चकार मोघांस्तान् बाणान् सयत्नान् भरतर्षभ ।। ११ ।। भरतश्रेष्ठ! तब गाण्डीवधारी शूरवीर अर्जुनने गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये बाणोंद्वारा मेघसन्धिके प्रयत्नपूर्वक चलाये गये उन सभी बाणोंको व्यर्थ कर दिया ।। ११ ।। स मोघं तस्य बाणौघं कृत्वा वानरकेतनः । शरान् मुमोच ज्वलितान् दीप्तास्यानिव पन्नगान् ।। १२ ।। शत्रुके बाणसमूहको निष्फल करके कपिध्वज अर्जुनने प्रज्वलित बाणका प्रहार किया। वे बाण मुखसे आग उगलनेवाले सर्पोंके समान जान पड़ते थे ।। १२ ।। ध्वजे पताकादण्डेषु रथे यन्त्रे हयेषु च । अन्येषु च रथाङ्गेषु न शरीरे न सारथौ ।। १३ ।। उन्होंने मेघसन्धिकी ध्वजा, पताका, दण्ड, रथ, यन्त्र, अश्व तथा अन्य रथांगोंपर बाण मारे; परंतु उसके शरीर और सारथिपर प्रहार नहीं किया ।। १३ ।। संरक्ष्यमाणः पार्थेन शरीरे सव्यसाचिना । मन्यमानः स्ववीर्यं तन्मागधः प्राहिणोच्छरान् ।। १४ ।। यद्यपि सव्यसाची अर्जुनने जान-बूझकर उसके शरीरकी रक्षा की तथापि वह मगधराज इसे अपना पराक्रम समझने लगा और अर्जुनपर लगातार बाणोंका प्रहार करता रहा ।। १४ ।।