भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1998, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1998

पर्याप्तः क्षत्रधर्मोऽयं दर्शितः पुत्र गम्यताम् । बह्वेतत् समरे कर्म तव बालस्य पार्थिव ॥ २३ ॥ ‘बेटा! तुमने क्षत्रियधर्मका पूरा-पूरा प्रदर्शन कर लिया। अब अपने घर जाओ। भूपाल! तुम अभी बालक हो। इस समरांगणमें तुमने जो पराक्रम किया है, यही तुम्हारे लिये बहुत है ॥ २३ ॥

युधिष्ठिरस्य संदेशो न हन्तव्या नृपा इति । तेन जीवसि राजंस्त्वमपराध्दोऽपि मे रणे ॥ २४ ॥ ‘राजन्! महाराज युधिष्ठिरका यह आदेश है कि ‘तुम युद्धमें राजाओंका वध न करना।’ इसीलिये तुम मेरा अपराध करनेपर भी अबतक जीवित हो’ ॥ २४ ॥

इति मत्वा तदात्मानं प्रत्यादिष्टं स्म मागधः । तथ्यमित्यभिगम्यैनं प्राञ्जलिः प्रत्यपूजयत् ॥ २५ ॥ अर्जुनकी यह बात सुनकर मेघसन्धिकाे यह विश्वास हो गया कि अब इन्होंने मेरी जान छोड़ दी है। तब वह अर्जुनके पास गया और हाथ जोड़ उनका समादर करते हुए कहने लगा— ॥ २५ ॥

पराजितोऽस्मि भद्रं ते नाहं योद्धुमिहोत्सहे । यद् यत् कृत्यं मया तेऽद्य तद् ब्रूहि कृतमेव तु ॥ २६ ॥ ‘वीरवर! आपका कल्याण हो। मैं आपसे परास्त हो गया। अब मैं युद्ध करनेका उत्साह नहीं रखता। अब आपको मुझसे जो-जो सेवा लेनी हो, वह बताइये और उसे पूर्ण की हुई ही समझिये’ ॥ २६ ॥

तमर्जुनः समाश्वास्य पुनरेवेदमब्रवीत् । आगन्तव्यं परां चैत्रीमश्वमेधे नृपस्य नः ॥ २७ ॥ तब अर्जुनने उसे धैर्य देते हुए पुनः इस प्रकार कहा—‘राजन्! तुम आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको हमारे महाराजके अश्वमेधयज्ञमें अवश्य आना’ ॥ २७ ॥

इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा पूजयामास तं हयम् । फाल्गुनं च युधि श्रेष्ठं विधिवत् सहदेवजः ॥ २८ ॥ उनके ऐसा कहनेपर सहदेवपुत्रने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और उस घोड़े तथा युद्धस्थलके श्रेष्ठ वीर अर्जुनका विधिपूर्वक पूजन किया ॥ २८ ॥

ततो यथेष्टमगमत् पुनरेव स केसरी । ततः समुद्रतीरेण वङ्गान् पुण्ड्रान् सकोसलान् ॥ २९ ॥ तदनन्तर वह घोड़ा पुनः अपनी इच्छाके अनुसार आगे चला। वह समुद्रके किनारे-किनारे होता हुआ वङ्ग, पुण्ड्र और कोसल आदि देशोंमें गया ॥ २९ ॥

तत्र तत्र च भूरीणि म्लेच्छसैन्यान्यनेकशः । विजिग्ये धनुषा राजन् गाण्डीवेन धनंजयः ॥ ३० ॥