महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2006, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय गान्धारराज शकुनिका पुत्र भागनेका अवसर देखने लगा। जैसे सिंहसे डरे हुए छोटे-छोटे मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार अर्जुनसे भयभीत हुए सैनिकोंके साथ वह स्वयं भी भाग निकला ॥ १४ ॥ तेषां तु तरसा पार्थस्तत्रैव परिधावताम् । प्रजहारोत्तमाङ्गानि भल्लैः संनतपर्वभिः ॥ १५ ॥ वहीं चक्कर काटनेवाले बहुत-से सैनिकोंके मस्तक अर्जुनने झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा वेगपूर्वक काट लिया ॥ १५ ॥ उच्छ्रितांस्तु भुजान् केचिन्नाबुध्यन्त शरैर्हतान् । शरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैः पृथुभिः पार्थचोदितैः ॥ १६ ॥ अर्जुनद्वारा चलाये और गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंसे कितने ही योद्धाओंकी ऊँची उठी हुई भुजाएँ कटकर गिर गयीं और उन्हें इस बातका पतातक न लगा ॥ १६ ॥ सम्भ्रान्तनरनागाश्वमपतद् विद्रुतं बलम् । हतविध्वस्तभूयिष्ठमावर्तत मुहुर्मुहुः ॥ १७ ॥ सम्पूर्ण सेनाके मनुष्य, हाथी और घोड़े घबराकर इधर-उधर भटकने लगे। सारी सेना गिरती-पड़ती भागने लगी। उनके अधिकांश सिपाही युद्धमें मारे गये या नष्ट हो गये और वह बार-बार युद्धभूमिमें ही चक्कर काटने लगी ॥ १७ ॥ नाभ्यदृश्यन्त वीरस्य केचिदग्रेऽग्रयकर्मणः । रिपवः पात्यमाना वै ये सहेयुर्धनंजयम् ॥ १८ ॥ श्रेष्ठ कर्म करनेवाले वीर अर्जुनके सामने कोई भी शत्रु खड़े नहीं दिखायी देते थे, जो अर्जुनकी मार पड़नेपर उनका वेग सहन कर सके ॥ १८ ॥ ततो गान्धारराजस्य मन्त्रिवृद्धपुरःसरा । जननी निर्ययौ भीता पुरस्कृत्यार्घ्यमुत्तमम् ॥ १९ ॥ तदनन्तर गान्धारराजकी माता अत्यन्त भयभीत होकर बूढ़े मन्त्रियोंको आगे करके उत्तम अर्घ्य ले नगरसे बाहर निकली और रणभूमिमें उपस्थित हुई ॥ १९ ॥ सा निवारयदव्यग्रं तं पुत्रं युद्धदुर्मदम् । प्रसादयामास च तं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् ॥ २० ॥ आते ही उसने अपने व्यग्रतारहित एवं रणोन्मत्त पुत्रको युद्ध करनेसे रोका और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले विजयशील अर्जुनको प्रिय वचनोंद्वारा प्रसन्न किया ॥ २० ॥ तां पूजयित्वा बीभत्सुः प्रसादमकरोत् प्रभुः । शकुनेश्चापि तनयं सान्त्वयन्निदमब्रवीत् ॥ २१ ॥