भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2011, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2011

बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके उस महायज्ञमें बहुत-से वेदवेत्ता मुनिगण भी पधारे थे॥ २२॥
ये च द्विजातिप्रवरास्तत्रासन् पृथिवीपते।
समाजग्मुः सशिष्यास्तान् प्रतिजग्राह कौरवः॥ २३॥
पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणोंमें जो श्रेष्ठ पुरुष थे, वे सब अपने शिष्योंको साथ लेकर वहाँ आये। कुरुराज युधिष्ठिरने उन सबको स्वागतपूर्वक अपनाया॥ २३॥
सर्वांश्च ताननुययौ यावदावसथान् प्रति।
स्वयमेव महातेजा दम्भं त्यक्त्वा युधिष्ठिरः॥ २४॥
वहाँ महातेजस्वी महाराज युधिष्ठिर दम्भ छोड़कर स्वयं ही उन सबका विधिवत् सत्कार करते और जबतक उनके लिये योग्य स्थानका प्रबन्ध न हो जाता, तबतक उनके साथ-साथ रहते थे॥ २४॥
ततः कृत्वा स्थपतयः शिल्पिनोऽन्ये च ये तदा।
कृत्स्नं यज्ञविधिं राज्ञो धर्मज्ञाय न्यवेदयन्॥ २५॥
तत्पश्चात् थवइयों और अन्यान्य शिल्पियों (कारीगरों) ने आकर राजा युधिष्ठिरको यह सूचना दी कि यज्ञमण्डपका सारा कार्य पूरा हो गया॥ २५॥
तच्छ्रुत्वा धर्मराजस्तु कृतं सर्वमतन्द्रितः।
हृष्टरूपोऽभवद् राजा सह भ्रातृभिरादृतः॥ २६॥
सब कार्य पूरा हो गया। यह सुनकर आलस्य-रहित धर्मराज राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ बहुत प्रसन्न हुए॥ २६॥

वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् यज्ञे प्रवृत्ते तु वाग्मिनो हेतुवादिनः।
हेतुवादान् बहूनाहुः परस्परजिगीषवः॥ २७॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! वह यज्ञ आरम्भ होनेपर बहुत-से प्रवचनकुशल और युक्तिवादी विद्वान्, जो एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखते थे, वहाँ अनेक प्रकारसे तर्ककी बातें करने लगे॥ २७॥
ददृशुस्तं नृपतयो यज्ञस्य विधिमुत्तमम्।
देवेन्द्रस्येव विहितं भीमसेनेन भारत॥ २८॥
भारत! यज्ञमें सम्मिलित होनेके लिये आये हुए राजा लोग घूम-घूमकर भीमसेनके द्वारा तैयार कराये हुए उस यज्ञमण्डपकी उत्तम निर्माण कला एवं सुन्दर सजावट देखने लगे। वह मण्डप देवराज इन्द्रकी यज्ञशालाके समान जान पड़ता था॥ २८॥
ददृशुस्तोरणान्यत्र शातकुम्भमयानि ते।
शय्यासनविहारांश्च सुबहून् रत्नसंचयान्॥ २९॥

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