भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2016, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2016

दीजियेगा ॥ १४ ॥ आगमिष्यन्ति राजानः सर्वे वै कौरवर्षभ । प्राप्तानां महतां पूजा कार्या ह्येतत् क्षमं हि नः ॥ १५ ॥ “(अर्जुन कहते हैं—) ‘कौरवश्रेष्ठ! अश्वमेधयज्ञमें प्रायः सभी राजा पधारेंगे। जो आ जायें उन सबको महान् मानकर उन सबका पूर्ण सत्कार करना चाहिये। यही हमारे योग्य कार्य है ॥ १५ ॥ इत्येतद्वचनाद् राजा विज्ञाप्यो मम मानद । यथा चात्ययिकं न स्याद् यदर्घ्याहरणेऽभवत् ॥ १६ ॥ (”इतना कहकर वे फिर मुझसे बोले—) ‘मानद! मेरी ओरसे तुम राजा युधिष्ठिरको यह सूचित कर देना कि राजसूय-यज्ञमें अर्घ्य देते समय जो दुर्घटना हो गयी थी, वैसी इस बार नहीं होनी चाहिये ॥ १६ ॥ कर्तुमर्हति तद् राजा भवांश्चाप्यनुमन्यताम् । राजद्वेषान्न नश्येयुरिमा राजन् पुनः प्रजाः ॥ १७ ॥ “श्रीकृष्ण! राजा युधिष्ठिरको ऐसा ही करना चाहिये। आप भी उन्हें ऐसी ही अनुमति दें और बतावें कि ‘राजन्! राजाओंके पारस्परिक द्वेषसे पुनः इन सारी प्रजाओंका विनाश न होने पावे’ ॥ १७ ॥ इदमन्यच्च कौन्तेय वचः स पुरुषोऽब्रवीत् । धनंजयस्य नृपते तन्मे निगदतः शृणु ॥ १८ ॥ (श्रीकृष्ण कहते हैं—) ‘कुन्तीनन्दन नरेश्वर! उस मनुष्यने अर्जुनकी कही हुई यह एक बात और बतायी थी, उसे भी मेरे मुँहसे सुन लीजिये ॥ १८ ॥ उपायास्यति यज्ञं नो मणिपूरपतिर्नृपः । पुत्रो मम महातेजा दयितो बभ्रुवाहनः ॥ १९ ॥ “हमलोगोंके इस यज्ञमें मणिपुरका राजा बभ्रुवाहन भी आवेगा, जो महान् तेजस्वी और मेरा परम प्रिय पुत्र है ॥ १९ ॥ तं भवान् मदपेक्षार्थं विधिवत् प्रतिपूजयेत् । स तु भक्तोऽनुरक्तश्च मम नित्यमिति प्रभो ॥ २० ॥ “प्रभो! उसकी सदा मेरे प्रति बड़ी भक्ति और अनुरक्ति रहती है। इसलिये आप मेरी अपेक्षासे उसका विधिपूर्वक विशेष सत्कार करें” ॥ २० ॥ इत्येतद् वचनं श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । अभिनन्द्यास्य तद् वाक्यमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २१ ॥ अर्जुनका यह संदेश सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उसका हृदयसे अभिनन्दन किया और इस प्रकार कहा ॥