महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवतितमोऽध्यायः
युधिष्ठिरके यज्ञमें एक नेवलेका उञ्छवृत्तिधारी ब्राह्मणके द्वारा किये गये सेरभर सत्तूदानकी महिमा उस अश्वमेधयज्ञसे भी बढ़कर बतलाना
जनमेजय उवाच
पितामहस्य मे यज्ञे धर्मराजस्य धीमतः ।
यदाश्चर्यमभूत् किंचित् तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! मेरे प्रपितामह बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके यज्ञमें यदि कोई आश्चर्यजनक घटना हुई हो तो आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रूयतां राजशार्दूल महदाश्चर्यमुत्तमम् ।
अश्वमेधे महायज्ञे निवृत्ते यदभूत् प्रभो ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— नृपश्रेष्ठ! प्रभो! युधिष्ठिरका वह महान् अश्वमेध-यज्ञ जब पूरा हुआ, उसी समय एक बड़ी उत्तम किंतु महान् आश्चर्यमें डालनेवाली घटना घटित हुई, उसे बतलाता हूँ; सुनो ॥ २ ॥
तर्पितेषु द्विजाग्र्येषु ज्ञातिसम्बन्धिबन्धुषु ।
दीनान्धकृपणे वापि तदा भरतसत्तम ॥ ३ ॥
घुष्यमाणे महादाने दिक्षु सर्वासु भारत ।
पतत्सु पुष्पवर्षेषु धर्मराजस्य मूर्धनि ॥ ४ ॥
नीलाक्षस्तत्र नकुलो रुक्मपार्श्वस्तदानघ ।
वज्राशनिसमं नादममुञ्चद् वसुधाधिप ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! भारत! उस यज्ञमें श्रेष्ठ ब्राह्मणों, जातिवालों, सम्बन्धियों, बन्धु-बान्धवों, अन्धों तथा दीन-दरिद्रोंके तृप्त हो जानेपर जब युधिष्ठिरके महान् दानका चारों ओर शोर हो गया और धर्मराजके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा होने लगी उसी समय वहाँ एक नेवला आया। अनघ! उसकी आँखें नीली थीं और उसके शरीरके एक ओरका भाग सोनेका था। पृथ्वीनाथ! उसने आते ही एक बार वज्रके समान भयंकर गर्जना की ॥ ३—५ ॥
सकृदुत्सृज्य तन्नादं त्रासयानो मृगद्विजान् ।
मानुषं वचनं प्राह धृष्टो बिलशयो महान् ॥ ६ ॥
बिलनिवासी उस धृष्ट एवं महान् नेवलेने एक बार वैसी गर्जना करके समस्त मृगों और पक्षियोंको भयभीत कर दिया और फिर मनुष्यकी भाषामें कहा— ॥ ६ ॥