महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2074, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'युधिष्ठिर! जब काल-क्रमसे मनुष्यका पाप नष्ट हो जाता है, तभी उसकी बुद्धि धर्माचरणमें लगती है ।। जन्मान्तरसहस्रैस्तु मनुष्यत्वं हि दुर्लभम् । तद् गत्वापीह यो धर्मं न करोति स्ववञ्चितः ।। 'हजारों योनियोंमें भटकनेके बाद भी मनुष्ययोनिका मिलना कठिन होता है। ऐसे दुर्लभ मनुष्य-जन्मको पाकर भी जो धर्मका अनुष्ठान नहीं करता, वह महान् लाभसे वंचित रह जाता है ।। कुत्सिता ये दरिद्राश्च विरूपा व्याधितास्तथा । परद्वेष्याश्च मूर्खाश्च न तैर्धर्मः कृतः पुरा ।। 'आज जो लोग निन्दित, दरिद्र, कुरूप, रोगी, दूसरोंके द्वेषपात्र और मूर्ख देखे जाते हैं, उन्होंने पूर्वजन्ममें धर्मका अनुष्ठान नहीं किया है ।। ये च दीर्घायुषः शूराः पण्डिता भोगिनस्तथा । नीरोगा रूपसम्पन्नास्तैर्धर्मः सुकृतः पुरा ।। 'किंतु जो दीर्घजीवी शूर-वीर, पण्डित, भोग-सामग्रीसे सम्पन्न, नीरोग और रूपवान् हैं, उनके द्वारा पूर्वजन्ममें निश्चय ही धर्मका सम्पादन हुआ है ।। एवं धर्मः कृतः शुद्धो नयते गतिमुत्तमाम् । अधर्मं सेवते यस्तु तिर्यग्योन्यां पतत्यसौ ।। 'इस प्रकार शुद्धभावसे किया हुआ धर्मका अनुष्ठान उत्तम गतिकी प्राप्ति कराता है, परंतु जो अधर्मका सेवन करते हैं, उन्हें पशु-पक्षी आदि तिर्यग्योनियोंमें गिरना पड़ता है ।। इदं रहस्यं कौन्तेय शृणु धर्ममनुत्तमम् । कथयिष्ये परं धर्मं तव भक्तस्य पाण्डव ।। 'कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! अब मैं तुम्हें एक रहस्यकी बात बताता हूँ, सुनो। पाण्डुनन्दन! मैं तुझ भक्तसे परम धर्मका वर्णन अवश्य करूँगा ।। इष्टस्त्वमसि मेऽत्यर्थं प्रपन्नश्चापि मां सदा । परमार्थमपि ब्रूयां किं पुनर्धर्मसंहिताम् ।। 'तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो और सदा मेरी शरणमें स्थित रहते हो। तुम्हारे पूछनेपर मैं परम गोपनीय आत्मतत्त्वका भी वर्णन कर सकता हूँ, फिर धर्मसंहिताके लिये तो कहना ही क्या है? ।। इदं मे मानुषं जन्म कृतमात्मनि मायया । धर्मसंस्थापनार्थाय दुष्टानां नाशनाय च ।। 'इस समय धर्मकी स्थापना और दुष्टोंका विनाश करनेके लिये मैंने अपनी मायासे मानव-शरीरमें अवतार धारण किया है ।। मानुष्यं भावमापन्नं ये मां गृह्णन्त्यवज्ञया ।