महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2078, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'प्रत्येक कल्पमें मेरे द्वारा जीवोंकी सृष्टि और संहारका कार्य होता है, किंतु मेरी मायासे मोहित होनेके कारण वे जीव मुझे नहीं जान पाते ।। मम चैवान्धकारस्य मार्गितव्यस्य नित्यशः। प्रशान्तस्येव दीपस्य गतिर्नैवोपलभ्यते ।। 'प्रलयकालमें जब दीपकके शान्त होनेकी भाँति समस्त व्यक्त सृष्टि लुप्त हो जाती है, तब खोज करने योग्य मुझ अदृश्यरूपकी गतिका उनको पता नहीं लगता ।। न तदस्ति क्वचिद् राजन् यत्राहं न प्रतिष्ठितः। न च तद् विद्यते भूतं मयि यन्न प्रतिष्ठितम् ।। 'राजन्! कहीं कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जिसमें मेरा निवास न हो तथा कोई ऐसा जीव नहीं है, जो मुझमें स्थित न हो ।। यावन्मात्रं भवेद् भूतं स्थूलं सूक्ष्ममिदं जगत् । जीवभूतो ह्यहं तस्मिंस्तावन्मात्रं प्रतिष्ठितः ।। 'जो कुछ भी स्थूल-सूक्ष्मरूप यह जगत् हो चुका है और होनेवाला है, उन सबमें उसी प्रकार मैं ही जीवरूपसे स्थित हूँ ।। किं चात्र बहुनोक्तेन सत्यमेतद् ब्रवीमि ते । यद् भूतं यद् भविष्यच्च तत् सर्वमहमेव तु ।। 'अधिक कहनेसे क्या लाभ, मैं तुमसे यह सच्ची बात बता रहा हूँ कि भूत और भविष्य जो कुछ है, वह सब मैं ही हूँ ।। मया सृष्टानि भूतानि मन्मयानि च भारत । मामेव न विजानन्ति मायया मोहितानि वै ।। 'भरतनन्दन! सम्पूर्ण भूत मुझसे ही उत्पन्न होते हैं और मेरे ही स्वरूप हैं। फिर भी मेरी मायासे मोहित रहते हैं, इसलिये मुझे नहीं जान पाते ।। एवं सर्व जगदिदं सदेवासुरमानुषम् । मत्तः प्रभवते राजन् मय्येव प्रविलीयते ।। 'राजन्! इस प्रकार देवता, असुर और मनुष्योंसहित समस्त संसारका मुझसे ही जन्म और मुझमें ही लय होता है' ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)