महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2082, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरपीडामकृत्वैव भृत्यवर्गं बिभर्ति यः ।
शूद्रोऽपि स्वर्गमाप्नोति जीवानांमभयप्रदः ॥
शूद्रोंमेंसे जो सदा तीनों वर्णोंकी सेवा करता और विशेषतः ब्राह्मणोंकी सेवामें दासकी भाँति खड़ा रहता है; जो बिना माँगे ही दान देता है, सत्य और शौचका पालन करता है, गुरु और देवताओंकी पूजामें प्रेम रखता है, परस्त्रीके संसर्गसे दूर रहता है, दूसरोंको कष्ट न पहुँचाकर अपने कुटुम्बका पालन-पोषण करता है और सब जीवोंको अभय-दान कर देता है, उस शूद्रको भी स्वर्गकी प्राप्ति होती है ॥
एवं धर्मात् परं नास्ति महत्संसारमोक्षणम् ।
न च धर्मात्परं किंचित् पापकर्मव्यपोहनम् ॥
इस प्रकार धर्मसे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। वही निष्कामभावसे आचरण करनेपर संसार-बन्धनसे मुक्ति दिलाता है। धर्मसे बढ़कर पाप-नाशका और कोई उपाय नहीं है ॥
तस्माद् धर्मः सदा कार्यो मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् ।
न हि धर्मानुरक्तानां लोके किंचन दुर्लभम् ॥
इसलिये इस दुर्लभ मनुष्य-जीवनको पाकर सदा धर्मका पालन करते रहना चाहिये। धर्मानुरागी पुरुषोंके लिये संसारमें कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है ॥
स्वयम्भूविहितो धर्मो यो यस्येह नरेश्वर ।
स तेन क्षपयेत् पापं सम्यगाचरितेन च ॥
नरेश्वर! ब्रह्माजीने इस जगत्में जिस वर्णके लिये जैसे धर्मका विधान किया है, वह वैसे ही धर्मका भलीभाँति आचरण करके अपने पापोंको नष्ट कर सकता है ॥
सहजं यद् भवेत् कर्म न तत् त्याज्यं हि केनचित् ।
स एव तस्य धर्मो हि तेन सिद्धिं स गच्छति ॥
मनुष्यका जो जातिगत कर्म हो, उसका किसीको त्याग नहीं करना चाहिये। वही उसके लिये धर्म होता है और उसीका निष्काम भावसे आचरण करनेपर मनुष्यको सिद्धि (मुक्ति) प्राप्त हो जाती है ॥
विगुणोऽपि स्वधर्मस्तु पापकर्म व्यपोहति ।
एवमेव तु धर्मोऽपि क्षीयते पापवर्धनात् ॥
अपना धर्म गुणरहित होनेपर भी पापको नष्ट करता है। इसी प्रकार यदि मनुष्यके पापकी वृद्धि होती है तो वह उसके धर्मको क्षीण कर डालता है ॥
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् देवदेवेश श्रोतुं कौतूहलं हि मे ।
शुभस्याप्यशुभस्यापि क्षयवृद्धी यथाक्रमम् ॥