महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2085, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें[व्यर्थ जन्म, दान और जीवनका वर्णन, सात्त्विक दानोंका लक्षण, दानका योग्य पात्र और ब्राह्मणकी महिमा]
वैशम्पायन उवाच
एवं श्रुत्वा वचस्तस्य धर्मपुत्रोऽच्युतस्य तु ।
पप्रच्छ पुनरप्यन्यं धर्मं धर्मात्मजो हरिम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर इस प्रकार भगवान् अच्युतके वचन सुनकर फिर भी श्रीहरिसे अन्य धर्म पूछने लगे— ॥
वृथा च कति जन्मानि वृथा दानानि कानि च ।
वृथा च जीवितं केषां नराणां पुरुषोत्तम ॥
'पुरुषोत्तम! कितने जन्म व्यर्थ समझे जाते हैं? कितने प्रकारके दान निष्फल होते हैं? और किन-किन मनुष्योंका जीवन निरर्थक माना गया है? ॥
कीदृशासु ह्यवस्थासु दानं दत्तं जनार्दन ।
इह लोकेऽनुभवति पुरुषः पुरुषोत्तम ॥
गर्भस्थः किं समश्नाति किं बाल्ये वापि केशव ।
यौवनस्थेऽपि किं कृष्ण वार्धके वापि किं भवेत् ॥
'पुरुषोत्तम! जनार्दन! मनुष्य किस अवस्थामें दिये हुए दानके फलका इस लोकमें अनुभव करता है। केशव! गर्भमें स्थित हुआ मनुष्य किस दानका फल भोगता है? श्रीकृष्ण! बाल, युवा और वृद्ध-अवस्थाओंमें मनुष्य किस-किस दानका फल भोगता है? ॥
सात्त्विकं कीदृशं दानं राजसं कीदृशं भवेत् ।
तामसं कीदृशं देव तर्पयिष्यति किं प्रभो ॥
'भगवन्! सात्त्विक, राजस और तामस दान कैसे होते हैं? प्रभो! उनसे किसकी तृप्ति होती है? ॥
उत्तमं कीदृशं दानं तेषां वा किं फलं भवेत् ।
किं दानं नयति ह्यूर्ध्वं किं गतिं मध्यमां नयेत् ।
गतिं जघन्यामथ वा देवदेव वदस्व मे ॥
'उत्तम दानका स्वरूप क्या है? और उससे मनुष्योंको किस फलकी प्राप्ति होती है? कौन-सा दान ऊर्ध्वगतिको ले जाता है? कौन-सा मध्यम गतिको और कौन-सा नीच गतिको ले जाता है? देवाधिदेव! यह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये ॥
एतदिच्छामि विज्ञातुं परं कौतूहलं हि मे ।
त्वदीयं वचनं सत्यं पुण्यं च मधुसूदन ॥
'मधुसूदन! मैं इस विषयको जानना चाहता हूँ और इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है; क्योंकि आपके वचन सत्य और पुण्यमय हैं' ॥