महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2100, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअविप्लुतब्रह्मचर्यैर्गृहस्थाश्रममाश्रितैः । पञ्चयज्ञपरैर्धर्मः स्थाप्यते पृथिवीतले ॥ जो गृहस्थ-आश्रममें स्थित होकर अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पञ्चयज्ञोंके अनुष्ठानमें तत्पर रहते हैं, वे पृथ्वीतलपर धर्मकी स्थापना करते हैं ॥ सायं प्रातस्तु ये संध्यां सम्यग्नित्यमुपासते । नावं वेदमयीं कृत्वा तरन्ते तारयन्ति च ॥ जो प्रतिदिन सबेरे और शामको विधिवत् संध्योपासना करते हैं, वे वेदमयी नौकाका सहारा लेकर इस संसार-समुद्रसे स्वयं भी तर जाते हैं और दूसरोंको भी तार देते हैं ॥ यो जपेत् पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम् । न सीदेत् प्रतिगृह्णानः पृथिवीं च ससागराम् ॥ जो ब्राह्मण सबको पवित्र बनानेवाली वेदमाता गायत्रीदेवीका जप करता है, वह समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका दान लेनेपर भी प्रतिग्रहके दोषसे दुखी नहीं होता ॥ ये चास्य दुःस्थिताः केचिद् ग्रहाः सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शुभकरास्तथा ॥ तथा सूर्य आदि ग्रहोंमेंसे जो उसके लिये अशुभ स्थानमें रहकर अनिष्टकारक होते हैं, वे भी गायत्री-जपके प्रभावसे शान्त, शुभ और कल्याणकारी फल देनेवाले हो जाते हैं ॥ यत्र यत्र स्थिताश्चैव दारुणाः पिशिताशनाः । घोररूपा महाकाया धर्षयन्ति न तं द्विजम् ॥ जहाँ कहीं क्रूर कर्म करनेवाले भयंकर विशालकाय पिशाच रहते हैं, वहाँ जानेपर भी वे उस ब्राह्मणका अनिष्ट नहीं कर सकते ॥ पुनन्तीह पृथिव्यां च चीर्णवेदव्रता नराः । चतुर्णामपि वेदानां सा हि राजन् गरीयसी ॥ वैदिक व्रतोंका आचरण करनेवाले पुरुष पृथ्वीपर दूसरोंको पवित्र करनेवाले होते हैं। राजन्! चारों वेदोंमें वह गायत्री श्रेष्ठ है ॥ अचीर्णव्रतवेदा ये विकर्मफलमाश्रिताः । ब्राह्मणा नाममात्रेण तेऽपि पूज्या युधिष्ठिर । किं पुनर्यस्तु संध्ये द्वे नित्यमेवोपतिष्ठते ॥ युधिष्ठिर! जो ब्राह्मण न तो ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं और न वेदाध्ययन करते हैं, जो बुरे फलवाले कर्मोंका आश्रय लेते हैं, वे नाममात्रके ब्राह्मण भी गायत्रीके जपसे पूज्य हो जाते हैं। फिर जो ब्राह्मण प्रातः-सायं दोनों समय संध्या-वन्दन करते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है? ॥ शीलमध्ययनं दानं शौचं मार्दवमार्जवम् । तस्माद् वेदाद् विशिष्टानि मनुरह प्रजापतिः ॥