भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2112, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2112

ते सुतृप्ताः सुखं यान्ति भवनैर्हंसचोदितैः ॥
जो समस्त प्राणियोंको जीवन देनेवाले जलका दान करते हैं, वे अत्यन्त तृप्त होकर हंस जुते हुए विमानोंद्वारा सुखपूर्वक धर्मराजके नगरमें जाते हैं॥

ये तिलं तिलधेनुं वा घृतधेनुमथापि वा ।
श्रोत्रियेभ्यः प्रयच्छन्ति सौम्यभावसमन्विताः ॥
सूर्यमण्डलसंकाशैर्यानैस्ते यान्ति निर्मलैः ।
गीयमानैस्तु गन्धर्वैर्वैवस्वतपुरं नृप ॥
राजन्! जो लोग शान्तभावसे युक्त होकर श्रोत्रिय ब्राह्मणको तिल अथवा तिलकी गौ या घृतकी गौका दान करते हैं, वे सूर्यमण्डलके समान तेजस्वी निर्मल विमानोंद्वारा गन्धर्वोंके गीत सुनते हुए यमराजके नगरमें जाते हैं॥

तेषां वाप्यश्च कूपाश्च तटाकानि सरांसि च ।
दीर्घिकाः पुष्करिण्यश्च सजलाश्च जलाशयाः ॥
यानैस्ते यान्ति चन्द्राभैर्दिव्यघण्टानिनादितैः ।
चामरैस्तालवृन्तैश्च वीज्यमानाः महाप्रभाः ।
नित्यतृप्ता महात्मानो गच्छन्ति यमसादनम् ॥
जिन्होंने इस लोकमें बावड़ी, कुएँ, तालाब, पोखरे, पोखरियाँ और जलसे भरे हुए जलाशय बनवाये हैं, वे चन्द्रमाके समान उज्ज्वल और दिव्य घण्टानादसे निनादित विमानोंपर बैठकर यमलोकमें जाते हैं; उस समय वे महात्मा नित्यतृप्त और महान् कान्तिमान् दिखायी देते हैं तथा दिव्यलोकके पुरुष उन्हें ताड़के पंखे और चँवर डुलाया करते हैं॥

येषां देवगृहाणीह चित्राण्यायतनानि च ।
मनोहराणि कान्तानि दर्शनीयानि भान्ति च ॥
ते व्रजन्त्यमलाभ्राभैर्विमानैर्वायुवेगिभिः ।
तत्पुरं प्रेतनाथस्य नानाजनपदाकुलम् ॥
जिनके बनवाये हुए देवमन्दिर यहाँ अत्यन्त चित्र-विचित्र, विस्तृत, मनोहर, सुन्दर और दर्शनीय रूपमें शोभा पाते हैं, वे सफेद बादलोंके समान कान्तिमान् एवं हवाके समान वेगवाले विमानोंद्वारा नाना जनपदोंसे युक्त यमलोककी यात्रा करते हैं॥

वैवस्वतं च पश्यन्ति सुखचित्तं सुखस्थितम् ।
यमेन पूजिता यान्ति देवसालोक्यतां ततः ॥
वहाँ जानेपर वे यमराजको प्रसन्नचित्त और सुखपूर्वक बैठे हुए देखते हैं तथा उनके द्वारा सम्मानित होकर देवलोकके निवासी होते हैं॥

काष्ठपादुकदा यान्ति तदध्वानं सुखं नराः ।
सौवर्णमणिपीठे तु पादं कृत्वा रथोत्तमे ॥