महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2119, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'समस्त लोकोंमें सदा रहनेवाले देवता, मनुष्य और तिर्यक् योनिके प्राणियोंमें सब समय सबके प्राण अन्नमें ही प्रतिष्ठित हैं।। अन्नं प्रजापते रूपमन्नं प्रजननं स्मृतम् । सर्वभूतमयं चान्नं जीवश्चान्नमयः स्मृतः ॥ 'अन्न प्रजापतिकारूप है। अन्न ही उत्पत्तिका कारण है। इसलिये अन्न सर्वभूतमय है और समस्त जीव अन्नमय माने गये हैं।। अन्नेनाधिष्ठितः प्राण अपानो व्यान एव च । उदानश्च समानश्च धारयन्ति शरीरिणम् ॥ 'प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान—ये पाँचों प्राण अन्नके ही आधारपर रहकर देहधारियोंको धारण करते हैं।। शयनोत्थानगमनग्रहणाकर्षणानि च । सर्वसत्त्वकृतं कर्म चान्नादेव प्रवर्तते ॥ 'सम्पूर्ण प्राणियोंद्वारा किये जानेवाले सोना, उठना, चलना, ग्रहण करना, खींचना आदि कर्म अन्नसे ही चलते हैं।। चतुर्विधानि भूतानि जंगमानि स्थिराणि च । अन्नाद भवन्ति राजेन्द्र सृष्टिरेशा प्रजापतेः ॥ 'राजेन्द्र! चारों प्रकारके चराचर प्राणी, जो यह प्रजापतिकी सृष्टि है, अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं।। विद्यास्थानानि सर्वाणि सर्वयज्ञाश्च पावनाः । अन्नाद यस्मात् प्रवर्तन्ते तस्मादन्नं परं स्मृतम् ॥ 'समस्त विद्यालय और पवित्र बनानेवाले सम्पूर्ण यज्ञ अन्नसे ही चलते हैं। इसलिये अन्न सबसे श्रेष्ठ माना गया है।। देवा रुद्रादयः सर्वे पितरोऽप्यग्नयस्तथा । यस्मादन्नेन तुष्यन्ति तस्मादन्नं विशिष्यते ॥ 'रुद्र आदि सभी देवता, पितर और अग्नि अन्नसे ही संतुष्ट होते हैं; इसलिये अन्न सबसे बढ़कर है।। यस्मादन्नात् प्रजाः सर्वाः कल्पे कल्पेऽसृजत् प्रभुः । तस्मादन्नात् परं दानं न भूतं न भविष्यति ॥ 'शक्तिशाली प्रजापतिने प्रत्येक कल्पमें अन्नसे ही सारी प्रजाकी सृष्टि की है; इसलिये अन्नसे बढ़कर न कोई दान हुआ है और न होगा।। यस्मादन्नात् प्रवर्तन्ते धर्मार्थौ काम एव च । तस्मादन्नात् परं दानं नामुत्रेह च पाण्डव ॥