भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2124, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2124

न चातिथिं पूजयति वृथा भवति स द्विजः ॥ ‘जो प्रतिदिन सांगोपांग वेदोंका स्वाध्याय करता है, किंतु अतिथिकी पूजा नहीं करता, उस द्विजका जीवन व्यर्थ है ॥

पाकयज्ञमहायज्ञैः सोमसंस्थाभिरेव च। ये यजन्ति न चार्चन्ति गृहेष्वतिथिमागतम् ॥ तेषां यशोऽभिकामानां दत्तमिष्टं च यद् भवेत्। वृथा भवति तत् सर्वमाशया हि तया हतम् ॥ ‘जो लोग पाक-यज्ञ, पञ्चमहायज्ञ तथा सोमयाग आदिके द्वारा यजन करते हैं, परंतु घरपर आये हुए अतिथिका सत्कार नहीं करते, वे यशकी इच्छासे जो कुछ दान या यज्ञ करते हैं, वह सब व्यर्थ हो जाता है। अतिथिकी मारी गयी आशा मनुष्यके समस्त शुभ-कर्मोंका नाश कर देती है ॥

देशं कालं च पात्रं च स्वशक्तिं च निरीक्ष्य च। अल्पं समं महद् वापि कुर्यादातिथ्यमाप्तवान् ॥ ‘इसलिये श्रद्धालु होकर देश, काल, पात्र और अपनी शक्तिका विचार करके अल्प, मध्यम अथवा महान् रूपमें अतिथि-सत्कार अवश्य करना चाहिये ॥’

सुमुखः सुप्रसन्नात्मा धीमानतिथिमागतम्। स्वागतेनासनेनाद्भिर्न्नाद्येन च पूजयेत् ॥ ‘जब अतिथि अपने द्वारपर आवे, तब बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह प्रसन्नचित्त होकर हँसते हुए मुखसे अतिथिका स्वागत करे तथा बैठनेको आसन और चरण धोनेके लिये जल देकर अन्न-पान आदिके द्वारा उसकी पूजा करे ॥

हितः प्रियो वा द्वेष्यो वा मूर्खः पण्डित एव वा। प्राप्तो यो वैश्वदेवान्ते सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥ ‘अपना हितैषी, प्रेमपात्र, द्वेषी, मूर्ख अथवा पण्डित—जो कोई भी बलिवैश्वदेवके बाद आ जाय, वह स्वर्गतक पहुँचानेवाला अतिथि है ॥

क्षुत्पिपासाश्रमार्ताय देशकालागताय च। सत्कृत्यान्नं प्रदातव्यं यज्ञस्य फलमिच्छता ॥ ‘जो यज्ञका फल पाना चाहता हो, वह भूख-प्यास और परिश्रमसे दुःखी तथा देश-कालके अनुसार प्राप्त हुए अतिथिको सत्कारपूर्वक अन्न प्रदान करे ॥

भोजयेदात्मनः श्रेष्ठान् विधिवद् हव्यकव्ययोः। अन्नं प्राणो मनुष्याणामन्नदः प्राणदो भवेत् ॥ तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ॥ ‘यज्ञ और श्राद्धमें अपनेसे श्रेष्ठ पुरुषको विधिवत् भोजन कराना चाहिये। अन्न मनुष्योंका प्राण है, अन्न देनेवाला प्राणदाता होता है; इसलिये कल्याणकी इच्छा रखनेवाले