भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2129, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2129

देवदेव नमस्तेऽस्तु वासुदेव सुरेश्वर । गोकर्णस्य प्रमाणं वै वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**देवेश्वर कृष्ण! आपको नमस्कार है। सुरेश्वर! मुझे गोकर्णमात्र भूमिकी ठीक-ठीक माप बतलानेकी कृपा कीजिये ॥

श्रीभगवानुवाच शृणु गोकर्णमात्रस्य प्रमाणं पाण्डुनन्दन । त्रिंशद्दण्डप्रमाणेन प्रमितं सर्वतो दिशम् ॥ प्रत्यक् प्रागपि राजेन्द्र तत् तथा दक्षिणोत्तरम् । गोकर्णं तद्विदः प्राहुः प्रमाणं धरणेर्नृप ॥ **श्रीभगवान् बोले—**नृपश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! गोकर्णमात्र भूमिका प्रमाण सुनो। पूर्वसे पश्चिम और उत्तरसे दक्षिण चारों ओर तीस-तीस दण्ड* नापनेसे जितनी भूमि होती है, उसको भूमिके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष गोकर्णमात्र भूमिका माप बताते हैं ॥

सवृषं गोशतं यत्र सुख तिष्ठत्ययन्त्रितम् । सवत्सं कुरुशार्दूल तच्च गोकर्णमुच्यते ॥ कुरुश्रेष्ठ! जितनी भूमिमें खुली हुई सौ गौएँ बैलों और बछड़ोंके साथ सुखपूर्वक रह सकें, उतनी भूमिको भी गोकर्ण कहते हैं ॥

किंकरा मृत्युदण्डाश्च कुम्भीपाकाश्च दारुणाः । घोराश्च वारुणाः पाशा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥ निरया रौरवाद्याश्च तथा वैतरणी नदी । तीव्राश्च यातनाः कष्टा नोपसर्पन्ति भूमिदम् ॥ भूमिका दान करनेवाले पुरुषके पास यमराजके दूत नहीं फटकने पाते। मृत्युके दण्ड, दारुण कुम्भीपाक, भयानक वरुणपाश, रौरव आदि नरक, वैतरणी नदी और कठोर यम-यातनाएँ भी भूमिदान करनेवालोंको नहीं सतातीं ॥

चित्रगुप्तः कलिः कालः कृतान्तो मृत्युरेव च । यमश्च भगवान् साक्षात् पूजयन्ति महीप्रदम् ॥ चित्रगुप्त, कलि, काल, कृतान्त मृत्यु और साक्षात् भगवान् यम भी भूमिदान करनेवालेका आदर करते हैं ॥

रुद्रः प्रजापतिः शक्रः सुरा ऋषिगणास्तथा । अहं च प्रीतिमान् राजन् पूजयामो महीप्रदम् ॥ राजन्! रुद्र, प्रजापति, इन्द्र, देवता, ऋषिगण और स्वयं मैं—ये सभी प्रसन्न होकर भूमिदाताका आदर करते हैं ॥

कृशभृत्यस्य कृशगोः कृशाश्वस्य कृतातिथेः ।

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