महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2131, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस मूढो याति दुष्टात्मा नरकानेकविंशतिम् ।
नरकेभ्यो विनिर्मुक्तः शुनां योनिं स गच्छति ॥
जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको भूमिका दान करके उसीसे अपनी जीविका चलाता है, वह दुष्टात्मा मूर्ख इक्कीस नरकोंमें गिरता है। फिर नरकोंसे निकलकर कुत्तोंकी योनिको प्राप्त होता है॥
हलकृष्टा मही देया सबीजा सस्यमालिनी ।
अथवा सोदका देया दरिद्राय द्विजातये ॥
जिसमें हलसे जोतकर बीज बो दिये गये हों तथा जहाँ हरी-भरी खेती लहलहा रही हो, ऐसी भूमि दरिद्र ब्राह्मणको देनी चाहिये अथवा जहाँ जलका सुभीता हो, वह भूमि दानमें देनी चाहिये ॥
एवं दत्ता मही राजन् प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
सर्वान् कामानवाप्नोति मनसा चिन्तितानि च ॥
राजन्! इस प्रकार प्रसन्नचित्त होकर मनुष्य यदि पृथ्वीका दान करे तो वह सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त करता है ॥
बहुभिर्वसुधा दत्ता दीयते च नराधिपैः ।
यस्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य तदा फलम् ॥
बहुत-से राजाओंने इस पृथ्वीको दानमें दिया है और बहुत-से अभी दे रहे हैं। यह भूमि जब जिसके अधिकारमें रहती है, उस समय वही उसे दानमें देता है और उसके फलका भागी होता है ॥
यश्च रूप्यं प्रयच्छेद् वै दरिद्राय द्विजातये ।
कृशवृत्तेः कृशगवे स मुक्तः सर्वकिल्बिषैः ॥
पूर्णचन्द्रप्रकाशेन विमानेन विराजता ।
कामरूपी यथाकामं स्वर्गलोके महीयते ॥
जिसकी जीविका क्षीण और गौएँ दुर्बल हो गयी हैं, ऐसे दरिद्र ब्राह्मणको जो चाँदी दान करता है, वह सब पापोंसे छूटकर और सुन्दर रूप धारण करके पूर्णिमाके चन्द्रमाके प्रकाशके समान प्रकाशित विमानके द्वारा इच्छानुसार स्वर्गलोकमें महिमान्वित होता है ॥
ततोऽवतीर्णः कालेन लोके चास्मिन् महायशाः ।
सर्वलोकार्चितः श्रीमान् राजा भवति वीर्यवान् ॥
फिर पुण्यका क्षय होनेपर समयानुसार वहाँसे उतरकर इस लोकमें सम्पूर्ण लोगोंसे पूजित, धनवान्, महायशस्वी और महापराक्रमी राजा होता है ॥
तिलपर्वतकं यस्तु श्रोत्रियाय प्रयच्छति ।
विशेषेण दरिद्राय तस्यापि शृणु यत् फलम् ॥