महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2133, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनित्य अग्निहोत्र करनेवाला वेदवेत्ता ब्राह्मण दानका सदा पात्र है। जिसके पेटमें शूद्रका अन्न नहीं जाता, वह पात्रोंमें भी उत्तम पात्र है॥ यच्च वेदमयं पात्रं यच्च पात्रं तपोमयम्। असंकीर्णं च यत् पात्रं तत् पात्रं तारयिष्यति॥ जो वेदसम्पन्न पात्र है, जो तपोमय पात्र है और जो किसीका भी भोजन न करनेवाला पात्र है, वह पवित्र पात्र दाताका उद्धार कर देता है॥ नित्यस्वाध्यायनिरतास्त्वसंकीर्णेन्द्रियाश्च ये। पञ्चयज्ञपरा नित्यं पूजितास्तारयन्ति ते॥ जो ब्राह्मण नित्य स्वाध्यायमें संलग्न रहते हैं, जिनकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, जो सदा ही पञ्च महायज्ञ करनेमें तत्पर रहते हैं, वे पूजा करनेवालेका उद्धार कर देते हैं॥ ये क्षान्तिदान्ताः श्रुतिपूर्णकर्णा जितेन्द्रियाः प्राणिवधे निवृत्ताः। प्रतिग्रहे संकुचिता गृहस्था- स्ते ब्राह्मणास्तारयितुं समर्थाः॥ जो क्षमाशील, संयतचित्त और जितेन्द्रिय हैं, जिनके कान वेदवाणीसे भरे हुए हैं, जो प्राणियोंकी हत्यासे निवृत्त हो चुके हैं और जिनको दान लेनेमें संकोच होता है, ऐसे गृहस्थ ब्राह्मण दाताका उद्धार करनेमें समर्थ हैं॥ नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती नित्यस्वाध्यायी वृषलान्नवर्जी। ऋतौ गच्छन् विधिवच्चापि जुह्वत् स ब्राह्मणस्तारयितुं समर्थः॥ जो प्रतिदिन तर्पण करनेवाला, सदा यज्ञोपवीत धारण किये रहनेवाला, नित्यप्रति स्वाध्यायपरायण, शूद्रका अन्न न खानेवाला, ऋतुकालमें ही अपनी स्त्रीसे समागम करनेवाला और विधिपूर्वक अग्निहोत्र करनेवाला हो, वह ब्राह्मण दूसरोंको तारनेमें समर्थ होता है॥ ब्राह्मणो यस्तु मद्भक्तो मद्रागी मत्परायणः। मयि संन्यस्तकर्मा च स विप्रस्तारयेद् ध्रुवम्॥ जो ब्राह्मण मेरा भक्त, मुझमें अनुराग रखने-वाला, मेरे भजनमें परायण और मुझे ही कर्मफलोंको अर्पण करनेवाला है, वह ब्राह्मण अवश्य संसार-समुद्रसे तार सकता है॥ द्वादशाक्षरतत्त्वज्ञश्चतुर्व्यूहविभागवित्। अच्छिद्रपञ्चकालज्ञः स विप्रस्तारयिष्यति॥ जो द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-का तत्त्वज्ञ है, जो चतुर्व्यूहके विभागको जाननेवाला है एवं जो दोषरहित रहकर पाँचों समयकी उपासनाओंका ज्ञाता है,