महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'पाण्डुनन्दन! कपिला गौ पवित्र वस्तुओंमें सबसे बढ़कर पवित्र, मंगलजनक पदार्थोंमें सबसे अधिक मंगलस्वरूपा तथा पुण्योंमें परमपुण्यस्वरूपा है ।। तपसां तप एवाग्र्यं व्रतानामुत्तमं व्रतम् । दानानां परमं दानं निदानं ह्येतदक्षयम् ।। 'वह तपस्याओंमें श्रेष्ठ तपस्या, व्रतोंमें उत्तम व्रत, दानोंमें श्रेष्ठ दान और सबका अक्षय कारण है ।। क्षीरेण कपिलायास्तु दध्ना वा सघृतेन वा । होतव्यान्यग्निहोत्राणि सायं प्रातर्द्विजातिभिः । 'द्विजातियोंको चाहिये कि वे सायंकाल और प्रातःकालमें कपिला गौके दूध, दही अथवा घीसे अग्निहोत्र करें ।। कपिलाया घृतेनापि दध्ना क्षीरेण वा पुनः । जुह्वते येऽग्निहोत्राणि ब्राह्मणा विधिवत् प्रभो ।। पूजयन्त्यतिथींश्चैव परां भक्तिमुपागताः । शूद्रान्नाद् विरता नित्यं दम्भानृतविवर्जिताः ।। ते यान्त्यादित्यसंकाशैर्विमानैर्द्विजसत्तमाः । सूर्यमण्डलमध्येन ब्रह्मलोकमनुत्तमम् ।। 'प्रभो! जो ब्राह्मण कपिला गौके घी, दही अथवा दूधसे विधिवत् अग्निहोत्र करते हैं, भक्तिपूर्वक अतिथियोंकी पूजा करते हैं, शूद्रके अन्नसे दूर रहते हैं तथा दम्भ और असत्यका सदा त्याग करते हैं, वे सूर्यके समान तेजस्वी विमानोंद्वारा सूर्यमण्डलके बीचसे होकर परम उत्तम ब्रह्मलोकमें जाते हैं ।। शृङ्गाग्रे कपिलायास्तु सर्वतीर्थानि पाण्डव । ब्रह्मणो हि नियोगेन निवसन्ति दिने दिने ।। प्रातरुत्थाय यो मर्त्यः कपिलाशृङ्गमस्तकात् । यश्च्युतामम्बुधारां वै शिरसा प्रयतः शुचिः ।। स तेन पुण्यतीर्थेन सहसा हतकिल्बिषः । जन्मत्रयकृतं पापं प्रदहत्यग्निवत् तृणम् ।। 'युधिष्ठिर! ब्रह्माजीकी आज्ञासे कपिलाके सींगके अग्रभागमें सदा सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। जो मनुष्य शुद्धभावसे नियमपूर्वक प्रतिदिन सबेरे उठकर कपिला गौके सींग और मस्तकसे गिरती हुई जलधाराको अपने सिरपर धारण करता है, वह उस पुण्यके प्रभावसे सहसा पापरहित हो जाता है। जैसे आग तिनकेको जला डालती है, उसी प्रकार वह जल मनुष्यके तीन जन्मोंके पापोंको भस्म कर डालता है ।। मूत्रेण कपिलायास्तु यश्च प्राणानुपस्पृशेत् । स्नानेन तेन पुण्येन नष्टपापः स मानवः ।